यह पाकिस्तान की त्रासदी है कि यहां स्वतंत्र रूप से जम्हूरियत कभी ठीक से कायम ही नहीं हो सकी है। जम्हूरियत की जड़ों को यहां मजबूत होने ही नहीं दिया गया है। भारत के विपरीत यहां शुरू से ही फौज का दबदबा रहा है। कट्टरपंथी मजहबी ताकतों ने भी इसे कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बेशक इस्लामी विद्वान डॉ. ताहिर-उल कादरी के बहुचर्चित 'मिलियन मैन मार्च' में हजारों लोग जुटे हैं, मगर इसे जम्हूरियत की मजबूती का संकेत नहीं माना जा सकता है।
इसके उलट उन्होंने जिस तरह से देश के सियासी वर्ग को लताड़ा है और नेशनल असेंबली (संसद) के बारे में जो कुछ कहा है, उससे तो लगता है कि वह जम्हूरियत के ढांचे को ही मटियामेट करना चाहते हैं। उनके निशाने पर सिर्फ सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ही नहीं, विपक्षी दल भी हैं। यह सियासी वर्ग को सोचना चाहिए कि आखिर उनके खिलाफ लोगों में इतना गुस्सा क्यों है?
असल में पाकिस्तान में भी भारत की तरह भ्रष्टाचार आज एक बड़ा मुद्दा है। पाकिस्तान में 70 फीसदी सांसदों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। भारत के लोगों की तरह यहां के लोगों में भी राजनीतिक वर्ग के प्रति नाराजगी है। दोनों मुल्कों में भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था होने के बावजूद भारत और पाकिस्तान में बड़ा फर्क है। भारत में प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते हैं, उस पर मामला भी चलता है और वह चुनाव भी लड़ता है, चुनाव जीतता भी है। लोगों में राजनेताओं के प्रति नाराजगी तो दिखाई देती है, लेकिन लोकतंत्र के खिलाफ कोई नहीं बोलता, वहां इसकी जड़ें काफी मजबूत हैं।
अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का पूरा आंदोलन ही भ्रष्टाचार को लेकर राजनीतिक वर्ग के खिलाफ था, मगर उससे लोकतंत्र पर किसी तरह का खतरा नहीं था। वे चुनाव के खिलाफ भी नहीं थे, बल्कि केजरीवाल ने तो अब अपनी राजनीतिक पार्टी भी बना ली है। मगर, कादरी साहब के निशाने पर पाकिस्तान की सारी राजनीतिक पार्टियां हैं। वह जो बातें कह रहे हैं, उसमें समाधान का रास्ता नजर नहीं आता। ऐसा लगता है कि वह राजनीतिक वर्ग को ही कमजोर करना चाहते हैं।
कादरी नेशनल असेंबली और सभी स्टेट असेंबली को भंग कर अंतरिम सरकार की देखरेख में अगला चुनाव कराए जाने की मांग कर रहे हैं। यह मांग कुछ वर्ष पूर्व बांग्लादेश में लागू की गई अंतरिम सरकार की व्यवस्था की तरह है। सेना की सरपरस्ती में बनने वाली अंतरिम सरकार का किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं होता। यही नहीं, इससे पहले बांग्लादेश में न्यायपालिका की देखरेख में भी अंतरिम सरकार बन चुकी है। मगर पाकिस्तान के संविधान में संसद को भंग कर इस तरह की अंतरिम सरकार के गठन का प्रावधान नहीं है। यह तो संविधान के उलट बात हुई। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि उनका आंदोलन अन्ना हजारे के आंदोलन जैसा है।
कादरी साहब के साथ अभी फौज खुलकर दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें उसका समर्थन न हो। वह जो बातें कह रहे हैं, वह फौज के अनुकूल भी है। इसके बावजूद उनकी यह 'क्रांति' अरब क्रांति से अलग है। जैसा कि हमने मिस्र में देखा, जहां होस्नी मुबारक के खिलाफ वहां की सेना ने खुलकर मुस्लिम ब्रदरहुड का साथ दिया था, और आज भी उस पर फौज का साया है। यहां अभी ऐसी बात दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन अंतरिम सरकार के गठन की मांग के पीछे चुनाव को टालने का इरादा भी हो सकता है। और यदि ऐसा होता है, तो फौज द्वारा कमान अपने हाथ में लेते देर नहीं लगेगी।
ऐसा नहीं है कि मौलाना कादरी को अचानक लोगों का समर्थन मिला। असल में वह कुछ महीने से तैयारी कर रहे थे और दिसंबर में भी उन्होंने एक जलसा किया था। वह बहुत सोच-समझकर राजनेताओं को निशाना बना रहे हैं और फौज तथा न्यायपालिका की तारीफ कर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि पिछले वर्षों में पाकिस्तान में न्यायपालिका भी मजबूत हुई है। ज्यादा दिन नहीं हुए, जब न्यायपालिका की सख्ती के कारण प्रधानमंत्री तक को पद से हटना पड़ा। दूसरी ओर, भारत में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि न्यायपालिका प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दे।
देखा जाए, तो पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है, उससे जम्हूरियत को ही खतरा है। जब कभी लगा कि जम्हूरियत मजबूत हो रही है, तो उसके खिलाफ जानी-अनजानी ताकतें हावी हो गईं। पाकिस्तान का इतिहास पलटकर देखें, तो पता चलेगा कि इसके अस्तित्व में आने के बाद से चार बार फौज ने लोगों की चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त कर मार्शल लॉ लागू कर दिया। इसलिए मौजूदा हालात आशंकित करते हैं।