श्रीराम, सीता व लक्ष्मण के वन गमन के बाद दशरथ जी ने शोक में प्राण त्याग दिए। राजसिंहासन खाली न रहे, इसलिए परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में महर्षि वशिष्ठ जी ने भरत जी से राजगद्दी स्वीकार करने का आग्रह किया। इस आग्रह को सुनकर वह शोक भरे शब्दों में बोले, मेरे कारण सीता जी तथा श्रीराम जी को वन जाना पड़ा।
इसी शोक में पिताजी का देहांत हुआ। मुझ जैसे पाप के भागी को यदि अयोध्या जैसी पावन नगरी की गद्दी पर बैठाने का दुष्प्रयास किया गया, तो यह पृथ्वी पाताल में धंस जाएगी। अयोध्या का राजा केवल वह हो सकता है, जो निष्कलंक हो, धर्मशील हो।
अयोध्या के राजमहल में उपस्थित सभी राजगुरु तथा अन्य परिजन भरत जी के ये शब्द सुनकर हतप्रभ रह गए। भरत जी को काफी समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन वह महाराज बनने को तैयार नहीं हुए।
भरत जी आत्मग्लानि से भरे हृदय के साथ वन में भगवान श्रीराम के चरणों में पहुंचे। श्रीराम उनके हृदय के भावों को समझ गए और बोले, भैया भरत, अपने हृदय को ग्लानि से पूर्णतया मुक्त करो। तुम जैसी निश्छल पुण्यात्मा तीनों लोकों में नहीं है। मैं यह वरदान देता हूं कि तुम्हारा नाम स्मरण करते ही समस्त पाप और अमंगल दूर हो जाएंगे। भगवान श्रीराम के वाक्य सुनते ही भरत जी के नेत्रों से प्रेमाश्रु ढुलक पड़े।