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सीमाएं लांघने का दुष्परिणाम

Thu, 04 Jun 2015 07:27 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
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पिछले तीन वर्षों में तीन बड़ी पर्यावरणीय घटनाएं हमारे सामने हैं। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी, श्रीनगर में एक के बाद दूसरी बाढ़ और नेपाल का बड़ा भूकंप-ये सभी घटनाएं पृथ्वी से ही जुड़ी हैं, जिसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ा है। पहली दो घटनाएं पृथ्वी के साथ हमारे व्यवहार का परिणाम हैं, जबकि तीसरी पृथ्वी के अंदर की हलचलों के कारण जरूर हुई होगी, पर उसका सीधा प्रभाव और नुकसान भी इस बात पर निर्भर था कि हमने पृथ्वी से किस हद तक पहले से ही छेड़छाड़ कर रखी है।
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साफ-सी बात है कि पर्यावरण के बिफरने से मनुष्य की गतिविधियों पर सीधा असर पड़ता है। अब भूकंप को ही लीजिए। उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं, पर उससे होने वाले नुकसान को कम रखने के लिए हमें अपनी पृथ्वी से मिली स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। और यही हमने किया। अगर भूकंपों का इतिहास टटोला जाए, तो जान-माल का नुकसान वहीं ज्यादा उठाना पड़ा है, जहां हमने बेतरतीब तरीके से अपने रहन-सहन आवास-विकास के रास्ते बनाए। ये पर्यावरण के वे पहलू हैं, जो हमें बार-बार इशारा कर रहे हैं कि हम सीमाओं को न लाघें। जहां-जहां हमने सीमाएं लांघीं, वहां-वहां दुष्परिणाम सामने हैं।

अब केदारनाथ की त्रासदी को ही लीजिए। एक तरफ हमने अपनी अज्ञानता में पृथ्वी के तापक्रम को इस हद तक बढ़ा दिया कि जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े मुद्दे खड़े हो गए। इसी का परिणाम था कि केदारनाथ और उससे जुड़े तमाम क्षेत्रों में बारिश का कहर उस समय आया, जब मानसून के आने की कोई संभावना नहीं थी। इसी भ्रम में हजारों यात्री केदारनाथ में इकट्ठा थे। साथ में बेतरतीब निर्माण व तथाकथित अदूरदर्शी विकास ने उस बड़ी त्रासदी को जन्म दे दिया, जिसने हजारों जीवन को एक झटके में लील लिया।
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श्रीनगर में ही झेलम से ऐसी तबाही पहले कभी नहीं मची थी। वहां बाढ़ से असंख्य लोग एक साथ बेघर हो गए। पूरी घाटी जलमग्न हो गई। सैकड़ों लोगों का जीवन समाप्त हुआ और हजारों संकट में आ गए। यह भी दुर्भाग्य था कि छह महीने में सब कुछ दूसरी बार घटा। पहाड़ों में बार-बार होने वाली घटनाओं ने स्थानीय लोगों में भय पैदा कर दिया है। यहां अब मानसून या अन्य किसी भी तरह की वर्षा का स्वागत नहीं किया जा सकता। लगता है, पहाड़ अब सुरक्षित नहीं हैं, जहां से एक नए पलायन की शुरुआत हो गई। पहले लोग रोजगार के लिए इधर-उधर भटकते थे, अब जान बचाने के भी लाले पड़ गए। पुणे के पास के गांव मलिन की त्रासदी को ही देखिए। वहां एक ही रात में पूरा गांव मलबे के भीतर दब गया। प्रकृति ने सांस लेने का भी मौका नहीं दिया। उस त्रासदी की वजह यह थी कि मलिन का जलागम क्षेत्र पूरी तरह वन विहीन था, और मूसलाधार बारिश ने गांव के ऊपर मिट्टी के पहाड़ को जगह छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

दरअसल हमने शहर और गांव-दोनों को खतरे में डाल दिया है। बिगड़ती जलवायु के कारण जहां वनविहीन होते गांव बाढ़ों की मार झेल रहे हैं, वहीं बढ़ते प्रदूषण और गगनचुंबी इमारतों के कारण शहर हर तरह की प्राकृतिक हलचलों की चपेट में हैं। पूरे देश में खनन एक ऐसी बुराई के रूप में सामने आया है, जिसने नदी और पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है। दुर्भाग्य यह है कि खनन को राजनीतिक समर्थन और संरक्षण मिला हुआ है। ऐसे में होने वाली त्रासदी की आसानी से कल्पना की जा सकती है। अंधाधुंध खनन का आने वाले दिनों में भीषण परिणाम सामने आएगा। पर विद्रूप यह है कि इसका विरोध करने वाले आज विकास-विरोधी बताए जाते हैं।

हम यह समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि पहाड़ और नदियां ही नहीं रहेंगी, तो जीवन कैसे बचेगा। तब क्या शहर और क्या गांव- दोनों बड़े संकट में होंगे। गंगा को बचाने और उसे पवित्र करने की एक बड़ी पहल जरूर शुरू हुई है, लेकिन वह कितनी बचेगी, इसका पता तो बाद में चलेगा। जबकि दूसरी नदियों के बारे में तो कहीं कोई चिंता ही नहीं दिखाई देती।

यह बात समझ लेनी चाहिए कि किसी भी देश के विकास के केंद्र में स्थानीय संसाधन ही होते हैं। अगर उन्हीं का नुकसान करें और उनके संरक्षण-संवर्धन से दूर रहें, तो हमारा भविष्य निश्चित रूप से संकट में पड़ जाएगा। आज हमें जो सुख-सुविधा मिली हुई है, वे प्राकृतिक संसाधनों के कारण ही मिली हुई हैं। चाहे वह बिजली हो या खेती हो या फिर आवास-सबमें प्रकृति का प्रसाद जुड़ा है। मुश्किल यह है कि हमारी आवश्यकताएं तो तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन उसके विपरीत प्राकृतिक संसाधनों में भारी कमी दिखने लगी है। ऐसे में असंतुलन की स्थिति सब कुछ बर्बाद कर देगी।

पर्यावरण को बचाने की गंभीर पहल अब अनिवार्यतः शुरू होनी चाहिए। यह पहल सरकारों द्वारा तो हो ही, हर व्यक्ति को भी उसमें भागीदारी करनी चाहिए। सबको प्रकृति का प्रसाद पाना है, तो सबको दायित्व भी उठाना होगा। लेकिन आज ऐसा सोचने वाले बहुत कम हैं। हर व्यक्ति इतना आत्मकेंद्रित है कि सामूहिक दायित्वों की चिंता करना उसे समय की बर्बादी लगता है। पर हमें लोगों को यह याद दिलाना ही होगा कि प्रकृति सबकी कोशिशों से ही बच सकती है।

शायद हम आज पर्यावरण की फिक्र नहीं करना चाहते, लेकिन हम आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं से आंखें भला कैसे मूंद सकते हैं? यह तो तय है कि भविष्य की पीढ़ी हमारी मूढ़ नीतियों के लिए हमें कोसेगी, क्योंकि हमारी अदूरदर्शिता का खामियाजा उन्हें पानी, हवा, मिट्टी और वनस्पति के घोर संकट के रूप में झेलना ही पड़ेगा। तब वे हमें कृतज्ञता के साथ याद करना तो दूर, बल्कि इस कारण कोसेंगी कि हमने उनके लिए कुछ नहीं छोड़ा और उनका जीवन दूभर कर दिया। तब इसका जवाब देने के लिए हम नहीं होंगे।
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