एक राजा दरबार में आने वाले पंडितों, विद्वानों से प्रायः प्रश्न किया करते, संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण कौन है? सबसे बड़ा कर्तव्य क्या है? इन प्रश्नों के जवाब के रूप में कोई भगवान को, तो कोई प्रजापालक राजा को महत्वपूर्ण बताता। पर किसी के भी उत्तर से राजा संतुष्ट नहीं हो पाए।
एक दिन वह शिकार खेलने जंगल में गए। एक पशु का पीछा करते-करते वह बहुत दूर जा निकले। भीषण गरमी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा। उन्होंने सामने एक आश्रम देखा। वह आश्रम में पहुंचे, तो वहां साधना में लीन एक संत दिखाई दिए। कुछ ही क्षणों में राजा बेहोश होकर गिर पड़े। होश आने पर उन्होंने देखा कि संत उनके मुंह पर पानी के छीटें मार रहे हैं।
राजा ने विनम्रता से संत जी से कहा, भगवन, आप तो समाधि में लीन थे। आपने मुझ जैसे संसारी व्यक्ति के लिए अपनी समाधि भंग क्यों की? साधु ने उत्तर दिया, राजन, आपके प्राण संकट में थे। ऐसे समय में मेरे लिए भगवान के ध्यान की अपेक्षा आपकी सहायता को तत्पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य था।
धर्मशास्त्र हमें शिक्षा देते हैं कि समय और परिस्थिति को देखते हुए कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिए। पूजा-उपासना से ज्यादा महत्वपूर्ण किसी के प्राण बचाने का कार्य है। सर्वोपरि कर्तव्य क्या है, इसका निर्णय परिस्थिति को देखकर ही किया जा सकता है। राजा की जिज्ञासा का प्रत्यक्ष समाधान हो गया।