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हक की लड़ाई में सड़क पर

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जल, जंगल और जमीन, ग्राम सभा के हो अधीन। यही नारा विगत 20 नवंबर को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में गूंजा। इस नारे के साथ वहां से बड़ी कंपनियों के वर्चवस्वाद के खिलाफ सर्व सेवा संघ के नेतृत्व में जल, जंगल, जमीन स्वराज यात्रा निकली, जिसका पहला चरण राजधानी दिल्ली में राजघाट पर 48 घंटे के अनशन सत्याग्रह के साथ समाप्त होगा। देश भर से गांधी, विनोबा, जयप्रकाश के अनुयायियों के साथ अलग-अलग विचारधारा के वे लोग भी इस यात्रा में शामिल होंगे, जो जल, जंगल और जमीन को बचाने तथा इसे स्थानीय लोगों के अधिकारों के तहत बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं।
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यह यात्रा वस्तुतः व्यापक आंदोलन की शुरुआत है। आंकड़ा बताता है कि उदारीकरण के बाद से करीब एक करोड़ 80 लाख हेक्टेयर जमीन खेती से बाहर जा चुकी है, और यह भयानक प्रक्रिया अब भी जारी है। विकास के नाम पर नदियों की इतनी परियोजनाओं पर सरकारें मुहर लगा चुकी हैं कि यदि उन सब पर अमल हो, तो आगामी कुछ वर्षों में कई नदियों के गुण धर्म नष्ट हो जाएंगे, उनसे जुड़ी पारिस्थितिकी और आम लोगों की जीवन प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी।

उत्तराखंड का ही उदाहरण देखिए। यह राज्य अपनी प्राकृतिक विशिष्टता के कारण भारतीय सभ्यता और संस्कृति का उद्गम है। अलग राज्य की कल्पना के पीछे पहाड़ों, नदियों और जंगलों की विशिष्टता को अक्षुण्ण रखते हुए उसके अनुरूप स्वायत्त नीतियां बनाकर सहचर विकास की दिशा में आगे बढ़ने का विचार था। इसी सोच से आंदोलन निकला और प्रदेश बना। किंतु जिनके हाथों में शासन की बागडोर आई, उन्होंने इस लक्ष्य का लगभग गला ही घोंट दिया।
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उत्तराखंड में जमीनें वैसे ही कम हैं, और उसमें से करीब 31 हजार हेक्टेयर जमीन परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुकी हैं। राज्य की नदियों पर 558 परियोजनाओं में से कुछ पूरी हुईं हैं, कुछ पर काम हो रहा है और कुछ प्रतीक्षा में हैं। एक समय ये परियोजनाएं कुछ लोगों को भाती भी रही हों, पर धीरे-धीरे इनकी विनाशकारी परिणति को देखकर विरोध का माहौल बनने लगा।

वनाधिकार कानून सरकार ने लागू कर दिया, पर ज्यादातर जगहों पर जमीन और जंगल पर वनवासियों या स्थानीय वासियों का अधिकार नहीं है। इस यात्रा के दौरान ही ऋषिकेश का एक गांव पुनाऊ सामने आया। वहां के लोगों का दावा है कि वे 200 वर्षों से रह रहे हैं, पर उन्हें इस कानून के तहत आज तक स्थानीय निवासी मानकर अधिकार नहीं दिया गया। वहां वन अधिकारियों के लिए बिजली है, पर उनके लिए नहीं। स्थानीय कलक्टर की रिपोर्ट उनके पक्ष में आ गई है, पर उनकी स्थिति जस की तस है।

पहले उन लोगों ने ज्ञापन, धरना प्रदर्शन किया, पर कोई सुनवाई न होने से पिछले एक महीने से क्रमवार अनशन सत्याग्रह शुरू कर दिया। यात्रा के दौरान अगुंड़ा नामक गांव मिला, जहां लोगों ने विद्युत परियोजना का काम नहीं होने दिया है तथा अपनी आवश्यकता के लिए अपने संसाधनों से स्वयं बिजली बना रहे हैं। उनका कहना है कि अगर यहां परियोजना बनेगी, तो खेती नष्ट हो जाएगी और वे पशुपालन नहीं कर पाएंगे।

ये तो कुछ उदाहरण हैं। देश भर में यही स्थिति है। यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब भूमि अधिग्रहण विधयेक पर चर्चा करके इसे कानून का रूप दिया जाना है। लोग केवल असंतोष के कारण ही विरोध नहीं कर रहे, कहीं-कहीं कठिनाइयां देख लोगों ने स्वराज की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। उत्तरकाशी का एक गांव है खोलर, जहां ग्राम प्रधान निर्विरोध निर्वाचित हैं एवं उनकी देखरेख में गांव अपने संसाधनों से व्यवस्थाएं करता है। जंगल और पशुपालन वहां जीविकोपार्जन का साधन है। वहां महिलाओं ने जंगल लगाए, चारा लगाया और चारे के उपयोग की सीमा बांध दी।

सामूहिक आत्मनिर्भरता के ऐसे प्रयोग अन्य जगह भी हो रहे हैं। मौजूदा स्वराज यात्रा के तीन लक्ष्य हैं। एक जन जागरण एवं तमाम आंदोलनों को समन्वित कर राष्ट्रीय स्वरूप देना। संघर्ष के साथ स्वावलंबन की दृष्टि से कार्यक्रम, और व्यवस्था बदलने के लिए राजनीतिक संघर्ष, ताकि जल, जंगल, जमीन पर लोगों के अधिकार वाले स्वराज की कल्पना को शासन का जितना साथ चाहिए, वह मिल पाए।
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