गुजरात विधानसभा के चुनावी नतीजे कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के लिए अप्रत्याशित साबित हुए हैं। खासकर कांग्रेस के लिए करारा झटका है, क्योंकि उम्मीद के विपरीत गुजरात में उसका दो दशक पुराना राजनीतिक वनवास खत्म नहीं हो सका। राहुल गांधी के लिए यह अच्छा तोहफा नहीं है, जिनकी पार्टी के अध्यक्ष पद पर अभी-अभी ताजपोशी हुई है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का माइक्रो मैनेजमेंट हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की तिकड़ी के आक्रमक प्रचार पर भारी पड़ा।
इस बार कांग्रेस की हार एक अर्थ में और भी ज्यादा अपमानजनक है, क्योंकि पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को 2012 की तर्ज पर हार का स्वाद चखना पड़ा है। ये तीनों नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे समझे जाते थे। कांग्रेस के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई, लेकिन भाजपा के प्रति जो आक्रोश जनता में था उसे कांग्रेस अपनी तरफ नहीं खींच पाई। चुनाव अभियान का पूरा दारोमदार राहुल गांधी पर रहा। कांग्रेस का कोई राज्य स्तर का नेता, कोई चेहरा इस चुनाव में नहीं दिखा। चेहरा न होना गुजरात कांग्रेस की मजबूरी भी था और पार्टी की नीति भी।
उदार हिंदुत्व की राह पर चलते, शिव भक्त जनेऊ धारी राहुल गांधी 26 मंदिरों का भ्रमण, दर्शन करते हुए चुनाव प्रचार की कमान संभाले थे। अभियान प्रतिक्रियात्मक था। राहुल गांधी हिंदी में बोलते थे और मोदी गुजराती में। जाहिर है, मोदी राहुल से ज्यादा कनेक्ट होते थे, लोगों से। आखिर वह 'धरती पुत्र' से, 'गुजरात की अस्मिता', 'गुजरात की आन-बान और शान' थे, जिन्हें एक अति उत्साही और आक्रमक कांग्रेस नेता ने' नीच' कहकर ओबीसी समुदाय को, जिससे मोदी आते हैं, कांग्रेस के खिलाफ लामबंद कर दिया। वैसे भी हार्दिक पटेल के अनामत आंदोलन के चलते ओबीसी समुदाय, जो संख्या में पाटीदारों से कई गुना ज्यादा है, भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ गया।
यही भाजपा का गेम प्लान था, जिसमें वह पाटीदार फैक्टर को नाकाम करने में कामयाब रही। ओबीसी जो अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व में पाटीदारों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का विरोध करते थे, भाजपा के साथ चले गए। अल्पेश के और हार्दिक के दबाव में कांग्रेस ने तीस से अधिक वफादार पार्टी कार्यकर्ताओं की कीमत पर नए लोगों को टिकट दिए, जो भारी असंतोष और अंतर्कलह का कारण बना। भाजपा के प्रति किसानों में, व्यापारियों में दर्जनों कारणों से नाराजगी थी, लेकिन कांग्रेस को वोट देने के लिए उनके पास पांच कारण भी न थे। पिछले 22 सालों से, जबसे कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर रही, पार्टी का जनाधार 38-39 प्रतिशत होने के बावजूद वह कभी असरकार विपक्ष की भूमिका में नजर नहीं आई।
भाजपा की जीत के पीछे मोदी मैजिक, अमित की माइक्रो प्लानिंग के अनुरूप अनगिनत निर्दलीय उमीदवारों को खड़ा किया गया, वह भी एक कारण हो सकता है। वैसे तो भाजपा ने 182 में से एक भी सीट पर मुस्लिम को टिकट नहीं दिया, लेकिन बड़ी तादाद में उसने निर्दलीय मुस्लिम उमीदवार खड़े करवाए। गुजरात में भाजपा की यह चिरपरिचित रणनीति है। इन नतीजों के दूरगामी असर होने वाले हैं। अल्पेश ठाकोर कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा बन कर उभर सकते हैं, हार्दिक को अभी भी अग्नि परिक्षा देनी होगी। भाजपा उन पर शिकंजा कसने की कोशिश करेगी। जिग्नेश मेवाणी ने अपनी स्वतंत्र छवि बनाए रखी है। यह अहम विधानसभा चुनाव भले ही मोदी-अमित शाह जीत गए, उनके लिए आगे की राह आसान नहीं होगी।
-अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार