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विपक्षी एकता में कांग्रेस का पेच

रशीद किदवई
Updated Mon, 09 Jul 2018 05:25 PM IST
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विपक्षी एकता में कांग्रेस का पेच
अब क्या समय आ गया है, जब राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को अपनी प्रमुखता छोड़ देनी चाहिए? इसी वर्ष नवंबर-दिसंबर में चार राज्यों,  मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधानसभा चुनाव में यदि वह शानदार तरीके से जीत दर्ज नहीं करती है, तो हवा का रुख तेजी से देश की सबसे पुरानी पार्टी के खिलाफ हो जाएगा। राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को कुछ कड़वी गोलियां गटकनी होगी, तभी वह कुछ हासिल कर पाएगी।


राहुल को कुछ पक्की राजनीतिक रणनीति पर काम करने की जरूरत है, ताकि वह संभावित सहयोगियों को संसद के भीतर और बाहर खुश रख सकें। दरअसल इस बात के संकेत हैं कि 2019 में तय लोकसभा चुनाव को कुछ महीने पहले इन चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ कराया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तब परिस्थितियां बदल जाएंगी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और डॉ रमन सिंह के खिलाफ जो सत्ता विरोधी रुझान होगा, वह धुंधला पड़ जाएगा और लड़ाई नरेंद्र मोदी बनाम अन्य में तब्दील हो जाएगी। 


इस लिहाज से संसद का आगामी मानसून सत्र उन पचास विधेयकों और अध्यादेशों से कहीं अधिक अहम हो गया है, जिन्हें मंजूरी की जरूरत है। वास्तवमें विपक्ष की हलचल और उसके व्यवहार को बारीकी से देखने की जरूरत है, कि आखिर कैसा गठबंधन बन रहा है, किन दलों को साधने की कोशिश हो रही है, किन्हें तोड़ने की कोशिश हो रही है और नेतृत्व के मसले को कैसे सुलझाया जाएगा। सबसे पहला और अहम मुद्दा तो राज्यसभा के उपसभापति का पद ही है, जोकि पी जे कुरियन के सेवानिवृत्त होने से रिक्त हुआ है।


कांग्रेस ने अनौपचारिक रूप से संकेत दिए हैं कि वह तृणमूल कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार सुखेंदू शेखर राय का समर्थन कर सकती है। ऊपरी सदन में विभिन्न दलों की संख्या को देखते हुए राय को जीत दर्ज करने में कोई मुश्किल नहीं आनी चाहिए। 


लेकिन तृणमूल को समर्थन देने का फैसला करना कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि पार्टी की बंगाल इकाई समर्थन के मुद्दे पर पूरी तरह से बंटी हुई है। पार्टी के विधायकों, सांसदों और पदाधिकारियों में इस मुद्दे पर साफ विभाजन है। दोनों ही पक्ष नतीजे भुगतने की धमकी दे रहे हैं, फिर राहुल तृणमूल का समर्थन करें या फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का विरोध करें। 

वास्तव में मौजूदा परिस्थितियों में बहुचर्चित विपक्षी एकता अभी मृग मरीचिका है।


विपक्षी एकता की असली परीक्षा इस वर्ष दिसंबर की शुरुआत में होगी, जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की विधानसभाओं के चुनावों की घोषणा की जाएगी। यदि भाजपा शासित इन तीन राज्यों में कांग्रेस सफलता हासिल कर पाती है, जैसा कि कुछ चुनावी पंडित आकलन कर रहे हैं, तो राहुल की कांग्रेस में उत्साह का संचार होना स्वाभाविक है। इससे भाजपा की तर्ज पर 'हम आ गए' वाले भाव के कारण बसपा, तृणमूल, सपा जैसी गैर राजग पार्टियां और तीसरे मोर्चे के अग्रणी नायक छिटक सकते हैं।


यह किसी से छिपा नहीं है कि तीसरा मोर्चा वाले कमजोर कांग्रेस चाहते हैं ताकि मई 2019 में 1996 के राष्ट्रीय मोर्चे की पुनरावृत्ति की जा सके। लगता नहीं कि सपा, बसपा और तृणमूल राष्ट्रीय राजनीति में फिर से केंद्रीय भूमिका निभाने की कांग्रेस की आकांक्षा को पूरी करने में रुचि लेंगी। 
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गठबंधन को अंजाम देना आसान नहीं है, क्योंकि इसकी राह में कई चुनौतियां हैं। मसलन, मध्य प्रदेश में सपा, बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) के प्रभाव वाले कुछ क्षेत्र हैं। 2013 में सत्तारूढ़ भाजपा ने 165 सीटें जीती थीं और कांग्रेस ने सिर्फ 58। बसपा ने चार सीटें जीती थीं, जबकि सपा और जीजीपी को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन इन तीनों पार्टियों की वजह से भाजपा को 53 सीटों का फायदा हुआ था, क्योंकि विपक्ष के वोट बंट गए। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि इन पार्टियों ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा होता, तो भाजपा को बुंदेलखंड और पूर्वी मध्य प्रदेश में इन 53 सीटों को जीतना मुश्किल हो जाता। 


इसी तरह से छत्तीसगढ़ में विद्रोही अजीत जोगी मायावती से बात कर रहे हैं, जहां पांच से छह फीसदी सतनामी दलित वोट हार और जीत के बीच अहम भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस को उच्च स्तर पर मायावती से सीधा संपर्क करने की जरूरत है, संभवतः सोनिया गांधी और बसपा सुप्रीमो की स्तर की बातचीत ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थिति साफ कर सकती है। कांग्रेस इससे चिंतित हो सकती है, क्योंकि ऐसे में उसे लोकसभा की सीटों के बंटवारे के लिए भी उन जगहों पर सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल से समझौता करना पड़ेगा जहां उसकी अपनी स्थिति कमजोर है।


दूसरा और कहीं अधिक जटिल मुद्दा है भाजपा (मोदी) विरोधी गठबंधन का नेतृत्व। कांग्रेस ने राहुल की अगुआई में ऐसे किसे मोर्चे की अगुआई के इरादे को त्यागा नहीं है, लेकिन यदि नीतीश कुमार को छोड़ दें, तो भी मायावती और ममता बनर्जी इसके मजबूत दावेदार हैं। 


शुरुआत करने के लिए कांग्रेस को समान विचारधारा वाली पार्टियों (इसे गैर राजग दल पढ़ें) के बीच एक दूसरे को नुकसान न पहुंचाने के लिए समझौता करना चाहिए, क्योंकि ऐसा किया जा सकता है और इससे चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में लाभ मिल सकता है। दुर्भाग्य से राहुल गांधी के पास निष्क्रिय रहने का विकल्प नहीं है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का कट्टर विरोध करते हुए राहुल ने इस बात को नजरंदाज कर दिया कि उनकी पार्टी अपने घोषणापत्रों में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वायदा करती रही, लेकिन यूपीए के दस साल के शासन में उसने किया कुछ नहीं।


सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद केजरीवाल दिल्ली में भाजपा के खिलाफ विश्वसनीय चेहरा बन गए। ममता, चंद्रबाबू नायडू, पी विजयन और एच डी कुमारस्वामी जैसे अनेक नेताओं ने विपक्षी एकता के बहाने केजरीवाल के प्रति कहीं अधिक झुकाव दिखाया है। कांग्रेस को जल्दी अपनी स्थिति सुधारने की जरूरत है। 


-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विजिटिंग फेलो हैं।
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