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अपने ही कारणों से हारी कांग्रेस

Thu, 12 Dec 2013 01:45 PM IST
दीपंकर गुप्ता
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चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस को अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाना होगा, अन्यथा उसके लिए आगे की राह और भी मुश्किल भरी होगी। इसके लिए उसे सबसे पहले अपने नेतृत्व में बदलाव के लिए तैयार होना होगा।
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कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह गांधी-नेहरू परिवार से आगे देखना ही नहीं चाहती। जबकि वास्तविकता यह है कि देश की जनता इस पुरानी पार्टी में गांधी-नेहरू परिवार के राजनीतिक वर्चस्व से ऊब चुकी है।

वह इस परिवार के दायरे से बाहर नया नेतृत्व देखना चाहती है, लेकिन कांग्रेस आलाकमान किसी स्वतंत्र छवि वाले नेता को पनपने नहीं देना चाहता। इसकी मुख्य वजह यह है कि उसे अपने अस्तित्व का साफ खतरा नजर आता है।
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अब छत्तीसगढ़ के नेता अजीत जोगी का ही उदाहरण ले लीजिए। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अजीत जोगी को पसंद नहीं करता, लेकिन इस बार उसके सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

कांग्रेस आलाकमान से अलग अजीत जोगी की अपनी स्वतंत्र छवि होने के कारण ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया है। छत्तीसगढ़ में यदि कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी, तो उसका श्रेय अजीत जोगी के नेतृत्व को दिया जाना चाहिए, न कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को।

दिल्ली में शीला दीक्षित और राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकारों ने निश्चित रूप से काम किए हैं, लेकिन उन दोनों सरकारों को इसलिए हार का मुंह देखना पड़ा, क्योंकि दोनों ने कांग्रेस आलाकमान से अलग अपनी स्वतंत्र छवि विकसित नहीं की।

इसका नतीजा यह हुआ कि केंद्रीय नेतृत्व की नाकामियों का खामियाजा भी इन दोनों राज्यों की सरकारों को भुगतना पड़ा। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ जो जनलहर है, उसी ने शीला दीक्षित और अशोक गहलोत की सरकारों को हराया।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि वह सांगठनिक स्तर पर सुधार करेंगे और पार्टी को आम लोगों से जोड़ेंगे, लेकिन संगठन में सुधार सिर्फ कहने भर से नहीं होता। जब तक नए नेताओं को, स्थानीय नेताओं को आगे आने का मौका नहीं दिया जाएगा, संगठन में सुधार नहीं हो सकता। यह तभी हो सकता है, जब कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार के दायरे से बाहर निकलकर नए नेतृत्व विकसित करने का जोखिम उठाए।

इसके अलावा कई राज्यों में पार्टी अंतर्कलह का शिकार है, उसका भी खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। जब नेतृत्व में परिवर्तन होगा, तभी नीतियों में परिवर्तन हो सकता है और तभी पार्टी आम लोगों का विश्वास हासिल कर पाएगी।

इसके अलावा डॉ मनमोहन सिंह की सरकार ने भी कांग्रेस की विश्वसनीयता को बट्टा लगाया है। एक के बाद एक उजागर हुए घोटालों, निरंतर बढ़ती महंगाई तथा विदेश नीति के मामले में विफलता ने देश के आम लोगों को कांग्रेस से दूर कर दिया।

केंद्र सरकार और कांग्रेस भले ही भ्रष्टाचार और महंगाई पर अंकुश लगाने की बात कहती रही, लेकिन उसके लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जिस लोकपाल बिल को पारित करने के लिए देश भर में आंदोलन हुए, उसे भी इस सरकार ने लटका दिया, जिसका बुरा संदेश गया।

इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस अगर हारी है, तो अपनी गलतियों के कारण, न कि कथित मोदी लहर के कारण। अगर ऐसा होता, तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी को इतनी सफलता नहीं मिलती और भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आती। जिन राज्यों में भाजपा ने जीत हासिल की है, वहां भी मोदी लहर जैसी कोई बात नहीं थी, बल्कि वहां की सरकारों के कामकाज को देखकर ही जनता ने उन्हें जिताया।

हालांकि कांग्रेस के पास अब बहुत कम समय बचा है, लेकिन अगर उसे अपनी खोई हुई जमीन वापस लानी है और जनता का विश्वास हासिल करना है, तो उसे सबसे पहले अपने नेतृत्व में बदलाव लाना होगा और फिर जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी। सिर्फ बातें करने से काम नहीं चलने वाला।
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