संयोग से पिछले हफ्ते जब राहुल गांधी की घर वापसी का दिन आया, तो मैं एक जिम में वर्जिश करते समय टीवी देख रही थी। इसलिए उनकी वापसी का पल-पल देखने को मिला। मैंने देखा कि किस तरह उनके वतन वापस आने की खबर सुनते ही जमा हो गए पत्रकार उनके घर के सामने, और फिर बिल्कुल उसी तरह, जैसे क्रिकेट मैच में पल-दर-पल की खबर दी जाती है, राहुल की वापसी की खबरें मेरे पत्रकार बंधुओं ने सुनाईं।
यह सिलसिला कोई दो घंटे तक चलता रहा, और फिर अचानक स्क्रीन पर दिखा गाड़ियों का बड़ा काफिला, और राहुल आते ही गायब हो गए। पत्रकारों ने यकीन दिलाया कि लौटकर आ गए हैं युवराज, लेकिन जिम में जो टेलीविजन था, उस पर उनका चेहरा नहीं दिखा। हां, उनके बारे में बहुत कुछ सुनने को जरूर मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आश्वासन दिए कि पिछले आठ हफ्तों में राहुल गांधी ने एकांत में इतना चिंतन किया है, कि अब उनमें नई ऊर्जा आ गई है, जो जल्दी ही देशवासियों को भी दिखने लगेगी। बिल्कुल बदलकर आए हैं जी, और अब नरेंद्र मोदी की खैर नहीं। सोनिया-मनमोहन सरकार के पूर्व मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि मोदी के अच्छे दिन अब जाने वाले हैं, क्योंकि पिछले ग्यारह महीनों में जनता जान गई है कि उनके चुनावी वायदे झूठे थे। कोई परिवर्तन नहीं आया है। राहुल गांधी की घर वापसी के दिन इस तरह की इतनी बातें सुनने को मिलीं कि ऐसा लगा, मानो मोदी सरकार के जाने का समय आ गया है।
यथार्थ दोस्तो कुछ और है। पहली बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी के दौर को अभी लगभग चार साल बाकी हैं, सो चाहे कायाकल्प करवाकर लौटे हों राहुल गांधी, उनके सामने अभी इंतजार की लंबी घड़ियां हैं। दूसरी बात यह कि उनको पहले अपने ही साथियों को समेटना होगा। विपश्यना, योग या ध्यान में वह जब थे, तब शायद उनको खबर नहीं मिली होगी कि उनके जाने के बाद उनके करीबी साथियों ने उनके नेतृत्व को लेकर कितने सवाल उठाए हैं।
कहने का मतलब यह कि राहुल जी को उनकी छोटी-सी छुट्टी काफी महंगी पड़ सकती है। असल में, राजनीति में आने का अर्थ अक्सर होता है, जनता और देश की सेवा, जिससे छुट्टी लेना इस लोकतांत्रिक देश में महापाप माना जाता है। सवाल यह है कि इस बार राहुल जी घोषणा करके क्यों गए। उन्होंने पहले भी कई बार छुट्टियां ली हैं, तो इस बार बताकर जाने की क्यों जरूरत थी?
उनके समर्थक कहते हैं कि चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद उन्हें एकांत और आराम की आवश्यकता थी। सच क्या है, कोई नहीं जानता, लेकिन कांग्रेस के आम कार्यकर्ता चुपके से कहते हैं कि उन्हें कठिनाइयों के इस दौर में पार्ट टाइम नेता नहीं चाहिए, जब पार्टी के पास लोकसभा में सिर्फ 44 सीटें हैं। सो उनको अच्छा लगा, जब सोनिया जी ने राहुल के छुट्टी पर जाने के बाद डटकर मोदी सरकार की नीतियों का विरोध किया। लोकसभा में आवाज उठाई, राष्ट्रपति भवन तक पैदल गईं और जगह-जगह घूमकर आईं किसानों के साथ दुख बांटने।
सो घर वापिस तो आ गए हैं राहुल जी चिंतन करके, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी समस्याएं हर तरह से इतनी बढ़ गई हैं कि शायद एक और छुट्टी की जरूरत उनको जल्दी ही महसूस होने लग जाएगी। बुरे दिन हैं अब भी कांग्रेस के उस युवराज के लिए, जो कभी देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा करते थे।