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एक हिमालय नीति की भी जरूरत, सरकार के एजेंडे में शामिल हो इसका संरक्षण

सुरेश भाई Published by: सुरेश भाई Updated Sun, 08 Sep 2019 03:16 AM IST
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हिमालय का दृश्य जब आखों के सामने होता है, तो इसका मतलब समझ लीजिए कि यह अधिक गर्मी पैदा नहीं करता है। चारों ओर के पहाड़ पर बर्फ की सफेद चांदी दिखाई देगी। चौड़े पत्ते के जंगल, असंख्य जीव-जंतुओं के घर, सीढ़ीदार खेत, नदियां, गदेरे और संकरी सड़कें नजर आएंगी। यहां के ऊंचाई के क्षेत्रों में साधु, संतों की तपस्या की गुफाएं, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे भी मौजूद हैं।

लेकिन अब हिमालय का यह स्वरूप बदल रहा है। यहां के गांवों में गर्मी पड़ने लगी है। पखें, कूलर आदि चल रहे हैं। शीतकाल में बर्फ गिरते ही जल्दी पिघल जाती है। पानी के स्रोत सूख रहे हैं। जैव विविधता को नुकसान हो रहा है। कृषि उपज घट रही हैं। जैविक खेती पर रासायनिक खादों का खतरा है। मौसम एक महीना पीछे हट गया है। हिमालय बाढ़ भूस्खलन, भूकंप के लिए अति संवेदनशील बन गया है। यहां बसे हुए हजारों गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। लोग रोजी-रोटी के लिए पलायन कर रहे हैं। नदियों और सड़कों के किनारे बसे हुए कई गांव व शहर अपना अस्तित्व खो रहे हैं।



निश्चित ही तीर्थ यात्री और पर्यटक हिमालय की खुबसूरत वादियों का आनंद लेना चाहते हैं। लाखों लोग हर वर्ष दर्शनार्थी के रूप में यहां पहुंच रहे हैं। यह एक तरह का पर्यटन उद्योग बन गया है, जिससे अधिक से अधिक राजस्व कमाने की होड़ लगी है। पर्यटकों को सुविधा देने के नाम पर पंचतारा संस्कृति, बहुमंजिली इमारतों का निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, शराब और भोगवादी विकास ने हिमालय को कमजोर बना दिया है। इसी के चलते आवागमन की सड़कें और ऊंचाई तक जाने वाले पर्वतारोहियों के रास्ते भारी वर्षा और बर्फ के मौसम में अति जोखिम भरे बन गए हैं।

हिमालय की यह स्थिति नदियों और पहाड़ों पर विकास के नाम पर हो रही छेड़छाड़ का परिणाम है। निश्चित ही जलवायु परिवर्तन भी एक कारण है, जिसका सामना करने के लिए कोई मजबूत कार्य योजना नहीं है। अब हर कोई कह रहा है कि हिमालय के विकास पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

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हिमालय का दृश्य जब आखों के सामने होता है, तो इसका मतलब समझ लीजिए कि यह अधिक गर्मी पैदा नहीं करता है। चारों ओर के पहाड़ पर बर्फ की सफेद चांदी दिखाई देगी। चौड़े पत्ते के जंगल, असंख्य जीव-जंतुओं के घर, सीढ़ीदार खेत, नदियां, गदेरे और संकरी सड़कें नजर आएंगी। यहां के ऊंचाई के क्षेत्रों में साधु, संतों की तपस्या की गुफाएं, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे भी मौजूद हैं।

लेकिन अब हिमालय का यह स्वरूप बदल रहा है। यहां के गांवों में गर्मी पड़ने लगी है। पखें, कूलर आदि चल रहे हैं। शीतकाल में बर्फ गिरते ही जल्दी पिघल जाती है। पानी के स्रोत सूख रहे हैं। जैव विविधता को नुकसान हो रहा है। कृषि उपज घट रही हैं। जैविक खेती पर रासायनिक खादों का खतरा है। मौसम एक महीना पीछे हट गया है। हिमालय बाढ़ भूस्खलन, भूकंप के लिए अति संवेदनशील बन गया है। यहां बसे हुए हजारों गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। लोग रोजी-रोटी के लिए पलायन कर रहे हैं। नदियों और सड़कों के किनारे बसे हुए कई गांव व शहर अपना अस्तित्व खो रहे हैं।

निश्चित ही तीर्थ यात्री और पर्यटक हिमालय की खुबसूरत वादियों का आनंद लेना चाहते हैं। लाखों लोग हर वर्ष दर्शनार्थी के रूप में यहां पहुंच रहे हैं। यह एक तरह का पर्यटन उद्योग बन गया है, जिससे अधिक से अधिक राजस्व कमाने की होड़ लगी है। पर्यटकों को सुविधा देने के नाम पर पंचतारा संस्कृति, बहुमंजिली इमारतों का निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, शराब और भोगवादी विकास ने हिमालय को कमजोर बना दिया है। इसी के चलते आवागमन की सड़कें और ऊंचाई तक जाने वाले पर्वतारोहियों के रास्ते भारी वर्षा और बर्फ के मौसम में अति जोखिम भरे बन गए हैं।

हिमालय की यह स्थिति नदियों और पहाड़ों पर विकास के नाम पर हो रही छेड़छाड़ का परिणाम है। निश्चित ही जलवायु परिवर्तन भी एक कारण है, जिसका सामना करने के लिए कोई मजबूत कार्य योजना नहीं है। अब हर कोई कह रहा है कि हिमालय के विकास पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

जुलाई 2019 के अंतिम सप्ताह में मसूरी में 11 हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिमालयी विकास पर महत्वपूर्ण चर्चा की है, जिसे हिमालय कॉन्क्लेव का नाम दिया गया है। इस तरह की कॉन्क्लेव हर वर्ष किसी न किसी राज्य में आयोजित किए जाने का प्रस्ताव है। हिमालय के विषय पर मसूरी में हुई इस चर्चा को यदि आगे बढ़ाया जाता है, तो सरकार को हिमालयी मुद्दों को समझने में सहूलियतें होगी। 

वर्षों से इसकी पहल विशेषकर उतराखंड के पर्यावणविद और सामाजिक कार्यकर्ता करते आ रहे हैं। कई बार मांग की गई है कि हिमालय की विशेष भौगोलिक स्थिति के अनुसार यहां के विकास की नीति मैदानी मानकों से पृथक होनी चाहिए। दशकों पुराने इस महत्वपूर्ण विचार को तभी मजबूती मिलेगी, जब नीति आयोग और हिमालयी राज्य मिलकर संसद    से एक केंद्रीय हिमालय नीति बनाने का निर्णय करवा सकें।

काबिले गौर है कि सभी हिमालयी राज्य पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए केंद्रीय पर्वतीय विकास मंत्रालय की वकालत करने लगे है, परंतु पर्वतीय विकास मॉडल का क्या मंत्र होगा, इस पर मसूरी में हिमालय कॉन्क्लेव में खुलकर बात सामने नहीं आई है। कोई पृथक हिमालय विकास के मॉडल पर गहन चर्चा करने से पहले ही ग्रीन बोनस की जारेदार मांग उठाई गई है।

लेकिन इस विषय को उठाने के साथ हिमालयी राज्यों में निवास करने वाले लोगों द्वारा पाले जा रहे जंगलों के बदले उन्हें निःशुल्क पानी, कम कीमत पर बिजली, 50 प्रतिशत की छूट पर रसोई गैस, नौजवानों को रोजगार देने जैसे अहम विषयों पर जनता को स्पष्ट बताने में सफल नहीं हुए हैं। समय आ गया है कि हिमालयी विकास के मॉडल को तैयार करने के लिए प्रत्येक हिमालयी राज्य को समाज के साथ मिलकर ही होमवर्क करना    पड़ेगा। इसी से एक केंद्रीय हिमालय नीति का स्वरूप सामने आएगा।

हिमालय के सतत विकास के लिए नीति आयोग और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सैकड़ों पत्र हिमालय लोक नीति के मसौदे के साथ सौंपा गया है। समय रहते हिमालय बचाने की पहल केंद्र और संबंधित राज्यों की सरकार का एजेंडा बनना चाहिए।
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