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वर्चुअल व्यवहारों की उलझन और इंटरनेट का दौर

संजय वर्मा Published by: संजय वर्मा Updated Thu, 24 Dec 2020 03:50 AM IST
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Internet uses - फोटो : Pixabay

तकनीक और मशीनों से इंसानों का परिचय इस रूप में ज्यादा है कि वे उसके हुक्म की गुलाम हैं। इंटरनेट के आने तक मशीनों की इस हैसियत में कोई तब्दीली नहीं हुई और इंटरनेट का सारा तामझाम भी सोशल मीडिया के दौर तक ज्यादातर मामलों में हमारे सहायक की तरह ही रहा है। लेकिन कोरोना काल के इस झंझावात में शायद यह पहला ऐसा ऐतिहासिक मौका आया है, जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आदि तकनीकों से लैस वर्चुअल जिंदगी ने हम इंसानों को बेपर्दा कर दिया है। मशीन और तकनीक के जाल में उलझकर इसे लेकर हमारा मतिभ्रम बढ़ गया है कि जो अब तक आभासी या वर्चुअल था, वह अब नकली नहीं है। बल्कि अब वह हमारी असलियत का हिस्सा है और हमें उससे सामंजस्य बिठाना है। 



इस उलझाव को कुछ नजीरों से समझा जा सकता है। दिसंबर, 2020 की शुरुआत में खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंस लिंक पर मौजूद एक वकील बिना कमीज पहने नजर आया। जस्टिस एल. नागेश्वर राव  और जस्टिस हेमंत गुप्ता इससे काफी खफा हुए। अदालती सुनवाई के ही प्रसंग में ऐसी घटनाएं हमारे देश में अप्रैल और जून में भी हुई थीं, जब वकील या तो बनियान अथवा टी-शर्ट पहने या बिस्तर पर लेटे हुए ही डिजिटल सुनवाई में हिस्सा लेते नजर आए थे। इन घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यह कहने को मजबूर हुए हैं कि सुनवाई की जन प्रकृति को ध्यान में रखते हुए ‘अदालत के न्यूनतम शिष्टाचार’ का पालन होना चाहिए और मुकदमों में हिस्सा ले रहे वकील ‘पेश होने योग्य’ नजर आने चाहिए। ऐसे दृश्य अदालती सुनवाई से बाहर कई और मामलों में नजर आए हैं। खास तौर से स्कूल-कॉलेजों की वर्चुअल कक्षाओं में छात्रों की हास्यास्पद, बेहूदा हरकतों और अध्यापकों के साथ वर्चुअल बदतमीजी के किस्सों की भरमार है।  


अदालतों और स्कूल-कॉलेजों की कक्षाओं से बाहर दफ्तरी कामकाज, सेमिनार और वर्चुअल बैठकों का सिलसिला वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग संपन्न कराने वाले तमाम एप्स की बदौलत इधर चला है और दावा किया गया है कि इनके रहते कोई काम प्रायः अटका नहीं है। बेशक, बीते तीन दशकों से इंटरनेट के अभ्युदय के साथ वर्क फ्रॉम होम की वकालत भी की जाती रही है, अभी तक इस सूची में आईटी संबंधी कार्यों को ही शामिल किया जाता था। लेकिन कोरोना काल में सारे समीकरण उलट गए और वर्क फ्रॉम होम की मजबूरी ने डिजिटल प्रबंधों पर इंसानों पर हावी होने का मौका दे दिया। इसी बिंदु पर आकर डिजिटल शिष्टाचार या वर्चुअल व्यवहार के वे सवाल उठ खड़े हुए, जिन्हें लेकर अदालतों और अध्यापकों ने अपनी चिंताएं प्रकट की हैं।


एकबारगी व्यक्ति डिजिटल शिष्टाचार का विधिवत पालन कर ले, तो भी उसके परिवार का क्या किया जाए जो व्यक्ति से उसकी घर पर मौजूदगी के मुताबिक ही बर्ताव करता है। निश्चय ही कामकाजी डिजिटल जीवन आम जिंदगी के व्यवहारों से ज्यादा सतर्कता की मांग करता है, क्योंकि तकनीक इस मामले में जरा क्रूर है और वह हमारी मासूम हरकतों को भी अक्षम्य किस्म के अपराध में बदल सकती है। लेकिन डिजिटल सिवलिटी का यह मामला अदालतों, शिक्षकों और अधिकारियों से थोड़ी नरमी की उम्मीद भी करता है, क्योंकि सभ्यता इस किस्म के व्यवहार की जरूरतों को समझते हुए तालमेल की गुंजाइशों को खोज रही है। इसकी एक झलक डेढ़ साल पहले माइक्रोसॉफ्ट द्वारा जारी डिजिटल सिविलिटी इंडेक्स में मिली थी, जिसमें दावा किया गया था कि भारत के युवा इस मामले में तेजी दिखा रहे हैं और 22 देशों की सूची में सातवें स्थान पर आकर उन्होंने अपने डिजिटल व्यवहारों में सुधार के संकेत दिए हैं। 


आम जीवन में तो हम कई बातें संकेत में कह देते हैं। उंगली के इशारे से कोई काम समझाया जा सकता है, लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में यह संभव नहीं है। इसके लिए वर्चुअल हाथ उठाने का संकेत देना चाहिए। यह भी जरूरी है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान दूसरों को भी बोलने का मौका मिले। श्रोता के रूप में आवाज म्यूट रखना और कैमरा ऑफ रखना एक सामान्य डिजिटल शिष्टाचार है। यह डिजिटल शिष्टाचार सिर्फ कामकाज के दौरान ही कायम नहीं रहना चाहिए, बल्कि पारिवारिक बातचीत में भी यह बने रहना चाहिए। 

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