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कमजोर भाषा वालों का सम्मेलन

Thu, 10 Sep 2015 08:07 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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ये साहित्यकार भी कितने भोले हैं कि सरकार की मंशा समझ ही नहीं रहे हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि 'विश्व हिंदी सम्मेलन' का मकसद साहित्य नहीं, भाषा है, तो फिर साहित्यकारों के लिए जगह कहां बनती है! आंख के जो शिविर लगते हैं, उनमें आंख के दर्दी ही जाते हैं न! तो फिर भाषा के इस विश्व-सम्मेलन में उन्हें ही तो बुलाया जाएगा न, जिनके बारे में यह पक्का है कि उनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है। इसमें उन्हें ही बुलाया जाएगा न, जो भाषा में तंग-हाथ हैं।
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सरकार की यह सोच अच्छी है और इसका स्वागत होना चाहिए कि उसका ध्यान अपने दल के नेताओं की भाषा पर गया है। सरकार में रहने का वैसे ही कम मौका मिला... और मिला भी तो विश्व-सम्मेलन कहीं और हो गया। अब इतने सारे अज्ञानियों को विदेश तो नहीं ले जा सकते, इसलिए मौका हाथ लगा है, तो उन्हें ही अवसर क्यों न दिया जाए!

दुनिया भर से साहित्यकार बुला तो रही है सरकार! भारत के साहित्यकार क्या उनसे बढ़कर हैं! साहित्यकार किसी भी देश का हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। ये ही लोग कहते फिरते हैं कि साहित्य की कोई सीमा नहीं होती है, तो फिर किस बात की नाराजगी? सरकार ने बहुत कोशिश की साहित्यकारों को नजदीक लाने की, मगर ये तो ऐसे बिदकने लगते हैं, जैसे खुजली की दवा लगा दी हो। रायपुर में ही हमारे मुख्यमंत्री ने साहित्यकारों के कितने नखरे उठाए थे। हवाई-टिकट से लेकर फाइव-स्टार होटल तक लगा दिए थे सेवा में, मगर आधे भी नहीं आए। सरकार अगर यह सोचती है कि इस देश के साहित्यकार कांग्रेसी हैं, समाजवादी हैं, कम्युनिस्ट हैं, तो क्या गलत है!
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हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस सम्मेलन के बाद सरकारी दल में भाषा को लेकर गंभीरता पैदा होगी। हर रोज ऊटपटांग बयानबाजी कर सरकार की मिट्टी-पलीद करने में जो लोग लगे रहते हैं, उनमें भाषा के संस्कार आएंगे। रही बात साहित्य की, तो उसका क्या है, वह तो बगैर विश्व-सम्मेलन के भी होते रहता है। उसे सरकार की जरूरत भला कहां है!
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