मुझे 'मी टू' अभियान से दो मुख्य शिकायतें हैं। एक यह कि इससे नकल की बू आती है। यह अभियान हॉलीवुड की कुछ अभिनेत्रियों ने प्रसिद्ध निर्माता हार्वी वाइंस्टीन के खिलाफ पिछले वर्ष शुरू किया था। उनका आरोप था कि वाइंस्टीन ने उनके साथ तब दुष्कर्म किया था, जब वे उनसे काम मांगने गई थीं। इतनी अभिनेत्रियां आरोप लगाने सामने आईं कि वाइंस्टीन को गिरफ्तार किया गया और अब उन पर बलात्कार का मुकदमा चल रहा है। इसके बाद अमेरिका में 'मी टू' अभियान ने ऐसा तूल पकड़ा कि विभिन्न क्षेत्रों की महिलाएं प्रसिद्ध और शक्तिशाली मर्दों पर आरोप लगाने सामने आई हैं। कई लेखक, टीवी ऐंकर, राजनेता और खिलाड़ी इस अभियान के शिकार हुए हैं।
अमेरिका के लिए शायद यह अच्छी बात हो, लेकिन भारत में यह अभियान चलाना कैसे ठीक हो सकता है, जब इसका लाभ सिर्फ कुछ ऐसी महिलाओं को ही होता है, जिनकी आवाजें वैसे भी ऊंचे स्वरों में सुनाई देती हैं? इस देश में जो महिलाएं और बच्चियां वास्तव में बेजुबान हैं, उनका इस अभियान से न लाभ होता दिख रहा है, न उनका इससे कोई मतलब है। जिस देश में रोज बलात्कार के 106 एफआईआर दर्ज होते हों, और जहां हाल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, 10 में से चार नाबालिग बच्चियां अपने ही किसी भाई, पिता, चाचा या मामा का शिकार बनती हैं, उस देश में इस अभियान से कौन-सा परिवर्तन आने वाला है? भारत की इन बेटियों की आवाज उन गिने-चुने मौकों पर ही सुनाई देती है, जब 'मी टू' अभियान चलाने वाली अंग्रेजी भाषी महिलाओं को किसी निर्भया की मौत सताती है। इस अभियान से मुझे शिकायत यह भी है कि बिना सबूत पेश किए किसी को अपराधी मानना मेरी नजरों में ठीक नहीं है।
भारतीय न्याय प्रणाली का आधार है कि कोई व्यक्ति तब तक अपराधी नहीं माना जा सकता, जब तक उसका अपराध साबित नहीं होता। इस अभियान के तहत किसी पुरुष को अपराधी साबित करने के लिए किसी महिला का आरोप लगाना ही काफी है। यह कैसा न्याय है? ऊपर से इस अभियान से मुझे शिकायत यह भी है कि इसका पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है, सो कांग्रेस के प्रवक्ता खुलकर इस अभियान के समर्थन में आ गए हैं, ताकि मोदी सरकार के विदेश राज्य मंत्री को इस्तीफा देने या बर्खास्त करने की नौबत आ जाए। इस अभियान का इस हद तक राजनीतिकरण हो गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने खुद एलान कर दिया है कि यह इतना महत्वपूर्ण अभियान है कि इस पर वह खुद अपनी राय देना चाहते हैं। इस अभियान से अगर भारत की बेटियों की असली समस्याओं का समाधान दिखता, तो इसका मैं स्वागत करती। लेकिन ऐसा होता मुझे दूर तक नहीं दिखता। उल्टे कुछ मुट्ठी भर महिलाओं की तथाकथित समस्याओं को लेकर इतना हल्ला मच गया है कि इस शोर में भारत की उन बेहाल बेटियों की आवाजें डूब-सी गई हैं, जिन्हें अभी तक इतना भी अधिकार नहीं है कि तय कर सकें कि वे किससे शादी करेंगी। जब वे अपनी मर्जी से अपना वर चुनती हैं, तो अक्सर उनके परिजन ही उनको मार डालते हैं।
पिछले सप्ताह जिस दिन 'मी टू' अभियान को लेकर देश की अखबारों में खूब हल्ला मच रहा था, उसी दिन बिहार के नवादा जिले में अट्ठारह साल की एक मुस्लिम लड़की की हत्या उसके परिवार वालों ने पेड़ से बांधकर कोड़े मार-मारकर कर दी थी। उस लड़की का दोष यह था कि उसे एक हिंदू लड़के से प्यार हो गया था और दोनों ने भागकर शादी कर ली थी। इस हत्या की खबर ब्रिटिश अखबार डेली मेल में छपी, लेकिन भारत के अखबारों में नहीं।