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आइए, तबादलों का मौसम है

Wed, 15 Apr 2015 08:00 PM IST
कुमार विनोद
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एक चर्चित लेकिन पुराना फिल्मी गीत है-पतझड़ सावन बसंत बहार, एक बरस के मौसम चार, पांचवां मौसम प्यार का, इंतजार का! गीतकार ने छठे, सातवें आदि मौसमों का चुनाव श्रोताओं की पसंद पर छोड़ दिया है। किसी नेता से पूछिए, तो वह इस सूची में चुनावी मौसम को जरूर शामिल करवाना चाहेगा। इसी तरह सरकारी कर्मचारियों के लिए भला तबादलों के मौसम से बढ़कर खट्टा-मीठा अन्य कौन-सा मौसम होगा?
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जिस तरह निर्वाचित जनप्रतिनिधि कभी नहीं चाहता कि मध्यावधि चुनाव की नौबत आए, उसी तरह मलाईदार पद का सुख भोग रहा कर्मचारी भी नहीं चाहता कि कभी तबादले का मौसम आए। इसके विपरीत किसी सूखे पद पर कांटे की तरह सूख रहा कर्मचारी सपने में भी तबादला सूची में अपना नाम मनचाही पोस्टिंग के साथ सबसे ऊपर उसी तरह देखता है, जिस तरह चुनाव हारा प्रत्याशी जल्दी ही चुनाव होने और उसमें अपने जीतने की कामना करता है।

आमतौर पर तबादलों का मौसम सरकार बदलते या गर्मियों के जोर पकड़ते ही शुरू हो जाता है। ऐसे मौसम में सिर्फ वही भद्रजन मनचाहे स्थान पर कायम रह पाते हैं अथवा खुड्डेलाइन पोस्टिंग से उड़कर सीधे सोना उगलती सीट पर फिक्स हो जाते हैं, जिनकी जड़ें दूर सत्ता के गलियारों तक फैली होती हैं अथवा जो ‘पत्रम पुष्पम समर्पयामि’ को चरितार्थ करते हैं।
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इस मौसम में कर्मचारियों की सामान्य बोलचाल की भाषा में एनटीबीटी (नॉट टू बी ट्रांसफर्ड), लांगर स्टे, म्यूचुअल ट्रांसफर, कपल केस, कम्प्लेंट बेसिस, मेडिकल ग्राउंड जैसे नए शब्द शामिल हो जाते हैं। जिस तरह क्रिकेट मैच के दौरान लोग अक्सर पूछते हैं कि स्कोर क्या हुआ, उसी तरह तबादलों के मौसम में कर्मचारी एक दूसरे से पूछते हैं-लिस्ट आई क्या? ट्रांसफर फोबिया ग्रस्त कर्मचारी को पंकज उधास द्वारा गाई मशहूर गजल-आइए बारिशों का मौसम है, इन दिनों चाहतों का मौसम है, भी कुछ यों सुनाई देती है-आइए तबादलों का मौसम है, इन दिनों सिफारिशों का मौसम है।
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