वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को डूबने वाले वित्तीय संस्थानों में यस बैंक के शामिल होने के तुरंत बाद लोगों और बाजार को आश्वस्त करते हुए कहा कि 'हम किसी भी संस्थान को बर्बाद नहीं होने दे सकते।' यह आश्वासन निस्संदेह छूने वाला और शक्तिशाली है, पर आश्वासन की साख शब्दों पर नहीं, बल्कि अतीत की कार्रवाइयों पर निर्भर करती है। वित्त मंत्री चाहें, तो अपने मंत्रालय के अधिकारियों और विनियामक रिजर्व बैंक से इससे पहले डूब चुके बैंकों और गैरबैंकिंग वित्तीय संस्थानों की स्थिति की जांच करवा सकती हैं।
उदाहरण के लिए, वर्ष 2018 के पतझड़ में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएल ऐंड एफएस), 2019 की ग्रीष्म ऋतु में दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन (डीएचएफएल), और हाल ही में पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी बैंक) डूब गए। इनमें से हर संस्थान की पटकथा चिर-परिचित कथानक का अनुसरण करती है- प्रचार, अति आत्मविश्वास और त्रुटिपूर्ण वित्तीय मॉडल। लेबनानी-अमेरिकी विद्वान नसीम निकोलस तालेब कहते हैं कि भंगुरता उन चीजों का गुण होती है, जो अस्थिरता के प्रति अतिसंवेदनशील होती हैं। और वित्तीय क्षेत्र में अतिसंवेदनशीलता को तत्परता और खुलासे के स्तर से परिभाषित किया जाता है। आम तौर पर संस्थान के पतन की शुरुआत रिश्वत और धन के अवैध हस्तांतरण से होती है, उसके बाद प्रवर्तन निदेशालय द्वारा मनी लॉन्डरिंग के मामले दर्ज किए जाते हैं।
आईएल ऐंड एफएस का पतन भारत में अमेरिकी निवेश बैंक लेहमन ब्रदर्स के डूबने जैसा मामला था, जो मुंबई शेयर बाजार को लिखी दो पंक्तियों के पत्र से शुरू हुआ था, जिसमें आईडीबीआई बैंक द्वारा जारी किए गए लेटर ऑफ क्रेडिट का भुगतान करने में उसने अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। आईएल ऐंड एफएस के पतन के करीब 18 महीने बाद भी कर्ज देने वालों (क्रेडिटर्स), बैंक और म्यूचुअल फंड और जमाकर्ताओं को बैंक से अपना पैसा नहीं मिला है। पुराने जमाने में कहा जाता था कि 'आप कतार में हैं', लेकिन नए जमाने में किसी को नहीं पता कि कतार कहां से शुरू होती है।
सितंबर, 2019 में डीएचएफएल का पतन हो गया, लेकिन उसकी बर्बादी आईएल ऐंड एफएस के पतन से पूरी तरह से असंबद्ध नहीं थी। आईएल ऐंड एफएस की तरह हाउसिंग फाइनेंस संस्था डीएचएफएल का भी गलत नीतियों और भयावह प्रबंधन के कारण पतन हुआ। जिस तरह का विवाद और चर्चा आईएल ऐंड एफएस को लेकर दिखती है, डीएचएफएल भी वित्तीय बाजार का एक बड़ा खिलाड़ी था। मार्च, 2020 तक न तो डीएचएफएल के क्रेडिटर्स और न ही जमाकर्ताओं को इसमें अटके अपने करीब 5000 करोड़ रुपये वापस मिल पाए हैं।
पीएमसी बैंक, जो एक बार फिर ढहते हुए डीएचएफएल से संबद्ध था, डगमगाने के कगार पर था और जब उसकी बैलेंस शीट में अनपेक्षित गड़बड़ियां (उधार देने वाले से उधार लेने वाले तक, स्पष्ट रूप से संदिग्ध राजनीतिक कनेक्शन के साथ प्रोमोटरों के आश्वासन पर एक ही उधारकर्ता को 73 फीसदी कर्ज दिए गए) पाई गईं, तो उसका पूरी तरह से पतन हो गया। जीवन गंवाने और आंदोलन करने के बावजूद छह राज्यों के बचतकर्ताओं के दुखों का अभी अंत नहीं हुआ है।
यस बैंक की कहानी इन उदाहरणों से अलग नहीं है। इसकी स्थापना अति महत्वाकांक्षी राणा कपूर द्वारा 2004 में की गई थी और उसने 2015 तक इसे भारत में दुनिया का सबसे बेहतरीन बैंक बनाने का लक्ष्य रखा था। कपूर ने यस बैंक के विस्तार का प्रस्ताव रखा, तो मुंबई में कई लोगों ने ठेठ बंबइया शैली में पूछा, 'बॉस इसमें क्या जादू है।' यस बैंक के जादू की पहली झलक 2018 में मिली और इसकी गड़बड़ी के संकेत तब सामने आए, जब यह पता चला कि इसकी ऋण वृद्धि इसकी जमा वृद्धि से लगभग दोगुनी है। इसके जमाकर्ताओं और पुरी के भगवान जगन्नाथ के पैसे जोखिम में हैं, जो कि 2.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हैं। यह आश्वासन अच्छा है कि वित्त मंत्रालय किसी भी संस्थान को डूबने नहीं देगा और बैंक ने जिस तरह के प्रणालीगत जोखिम को प्रदर्शित किया है, उसे देखते हुए इससे सम्मानजनक उपाय कोई और था भी नहीं। वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक एसबीआई द्वारा देश के चौथे सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक का बचाव अनिवार्य रूप से दूसरे नाम से राष्ट्रीयकरण ही है। लेकिन लगातार ऐसे पतन से एक सवाल उठता है, जो वित्त मंत्री को अपने अधिकारियों और रिजर्व बैंक से पूछना चाहिए कि किस तरह से ये संस्थान पतन के कगार पर पहुंचते हैं। कॉरपोरेट स्तर पर प्रशासन खराब है, संस्थानों के बोर्ड में सुस्ती है, ऑडिटर्स कर्मठता से अपना काम करने में विफल रहे, रेटिंग एजेंसियों की कार्रवाई की नुक्ताचीनी की गई। इसके अलावा नियामक की भीरुता भी दिखी। मसलन, रिजर्व बैंक को 2014–15 में आईएल ऐंड एफएस मॉडल की गड़बड़ी का पता था, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। इसे प्रमोटरों व बैंकों के म्यूचुअल फंडों और एनबीएफसी के खेल का पता था। इसने यस बैंक के बोर्ड से राणा कपूर को हटा दिया, लेकिन फिर नए निवेशकों के लिए जांच की अनुमति दी, क्योंकि स्थितियां और बिगड़ गई थीं।
पतन की यह शृंखला शरलॉक होम्स के उस कुत्ते की कौतूहलपूर्ण कहानी की याद दिलाती है, जो भौंकता नहीं था। नियामकों ने यह जानने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि बाजार क्या जानता है और क्या प्रतिक्रिया दे रहा है। मैंने पहले भी उल्लेख किया था कि कैसे एक हाउसिंग फाइनेंस यूनिट, एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी और एक निजी क्षेत्र का बैंक अफवाहों में घिरा था और यह रेखांकित किया था कि कैसे मिलीभगत होती है। निचोड़ यह है कि विनियामक के दायरे में क्षमता और वित्त मंत्रालय के भीतर निवारण एवं समाधान के लिए परिस्थितियों का आकलन एवं विश्लेषण कर उपाय तलाशने की क्षमता का अभाव है। वित्तीय बाजार और संस्थान सिलसिलेवार ढंग से एक दूसरे से जुड़े तार के समान हैं, यदि एक बल्व काम करना बंद कर देता है, तो पूरा सर्किट काम करना बंद कर देता है। 28 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था लगातार बैंकों के डूबने को बर्दाश्त नहीं कर सकती है। इस विफलता की आशंका बाजार के अर्थशास्त्र में निहित हो सकती है। बहस इस बात को लेकर नहीं है कि क्या नहीं रोका जा सकता है, बल्कि इस बात को लेकर है कि क्या किया जा सकता था, जो नहीं किया गया।