यह मूसलाधार वर्षा का समय है, पर कहीं-कहीं बिन बरसते बादलों के घटाटोप में मुझे सरकारी मायाजाल दीख रहा है। बादलों के झुंड के झुंड आते हैं, जैसे सरकारी दफ्तरों के बाबू हों। बाबू जैसे पहला घंटा आपस में गप्पें मारकर बिताते हैं, वैसे ये बादल भी उमड़ते-घुमड़ते हैं, फिर इंद्र देवता के हाजिरी रजिस्टर में अपना नाम लिखाकर पता नहीं, कहां गायब हो जाते हैं। कुछ घंटों बाद फिर आकाशीय दफ्तर में दलालों की तरह आनेवाले पवन के झोंकों के साथ लौटकर, नीचे धरती पर कृपाकांक्षी आम आदमी पर उड़ती नजर डाल कहते हैं, आज बड़े साहब ने बुला लिया था, अतः तुम्हारा काम नहीं हो सका। कल आना।
जल के लिए तड़पते खेतों को छोड़ लाचार किसान शहर आता है। दिन भर रिक्शा-ठेला खींचने के श्रम से क्लांत होकर वह रात में फुटपाथ पर शरण लेता है। लेकिन आकाशीय सत्ता के नशे में चूर बादलों को यह विद्रोह-सा लगता है। उन्हें वे दिन याद आते हैं, जब कृपाकांक्षी किसान हवन-पूजन कर उन्हें मनाते थे। अब ऐसे भेंट-चढ़ावे लुप्त होने से बादलों को लगता है, जैसे उनके हक की ऊपरी आमदनी देने से इन्कार किया जा रहा हो। अतः व्यवस्था को चुनौती देने वाले प्रदर्शनकारियों पर जलवृष्टि करने के अंदाज में ये बादल उन विस्थापितों पर टूट पड़ते हैं।
निचली सतह के बादल तृतीय-चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों की याद दिलाते हैं, तो ऊंचाइयों वाले बादल टाइम पास वाली मुद्रा में पसरे रहते हैं, जैसे उच्च पदासीन अधिकारी बिना कोई निर्णय लिए शांति से अपना कार्यकाल पूरा करने को प्रतीक्षारत हों। उलाहना देने पर पिछले साल केदारनाथ की आकाशफोड़ वृष्टि की याद दिलाते हुए कहते हैं, याद है, केदारनाथ के जिलाधीश बादल जी की? अपने कार्यकाल में जो जोश उन्होंने दिखाया, उसकी अब भी सीबीआई जांच चल रही है। हमें तो चैन से रिटायर हो लेने दो।
फिर हर स्तर के सरकारी बाबुओं की अकर्मण्यता की याद दिलाते ये बादल भी बिना कुछ किए सिर के ऊपर से गुजर जाते हैं।