अक्तूबर-नवंबर के गुलाबी जाड़ों में, रबी की फसल में, भारत के आठ प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र में गेहूं की बुआई होती है। फिर ठंडी रातें, धुंध वाली सुबहें, जनवरी की ठिठुरन, और फरवरी की हल्की धूप से गुजर कर, गेहूं तैयार होता है। इसे सिर्फ खेत में मिट्टी, खाद और पानी ही नहीं, बल्कि जाड़ों की ठंडक का मौसम भी पालता है।
भारत में गेहूं सिर्फ एक फसल नहीं है। यह करोड़ों लोगों की रोटी है। गांव की अर्थव्यवस्था है। और शायद यही वजह है कि खेतों में बदलता मौसम अब सिर्फ किसानों की समस्या नहीं रह गया। यह धीरे-धीरे हर रसोई तक पहुंचने वाली कहानी बनता जा रहा है। गौरतलब है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है और दुनिया के कुल गेहूं उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है। अपनी जरूरत से ज्यादा भारत अपना गेहूं- संयुक्त अरब अमीरात और बांग्लादेश जैसे देशों को निर्यात करता है, जो किसानों के लिए एक मुनाफे का सौदा है। 2022 में भीषण गर्मी (हीटवेव) के कारण गेहूं के उत्पादन में कमी और वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतों के दबाव के चलते 13 मई, 2022 को अचानक निर्यात पर रोक लगा दी गई। वर्ष 2025 में भी भारत का गेहूं निर्यात मुख्य रूप से घरेलू खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने के कारण प्रतिबंधित श्रेणी में रहा।
पिछले कुछ साल से जलवायु परिवर्तन के चलते सिकुड़ रही सर्दियों और बढ़ रही गर्मियों के चलते गेहूं को ठंड के झोंके देकर पालने वाले मौसम की लय टूट रही है। तपती रातों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। ठंड का मौसम सिकुड़ रहा है। अब दिसंबर से पहले उत्तरी भारत के मैदानों में ठंड का एहसास ही नहीं होता। तापमान में अचानक वृद्धि (खासकर रात में) से दानों का आकार सिकुड़ रहा है। भारत के गेहूं उत्पादन का बड़ा हिस्सा हरियाणा और पंजाब से आता है, जिन्हें हरित क्रांति का केंद्र माना जाता है। 1986 से 1995 के बीच हरियाणा में गेहूं उत्पादन की दशकवार वृद्धि दर लगभग 30 प्रतिशत थी। लेकिन 2015 से 2025 के बीच यह दर घटकर -2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है। पंजाब में भी लगभग ऐसा ही रुझान दिखाई दिया है।
जलवायु परिवर्तन की वजह से अचानक हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ गई हैं। इससे तैयार खड़ी फसल को अक्सर नुकसान पहुंचा है। मौसम का यह बदला मिजाज खरपतवार और कीटों को भी बढ़ावा देता है। वीट अंडर स्ट्रेस नाम की हाल ही में जारी एक नई रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। जलवायु परिवर्तन के इस खतरे से निपटने के लिए वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ - अधिक तापमान को सहन करने वाली और कम समय में पकने वाली नई किस्मों को बोने के विकल्प पर जोर दे रहे हैं।