विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की वैश्विक जलवायु स्थिति, 2024 रिपोर्ट में वर्ष 2024 को अब तक के सबसे गर्म वर्षों में से एक माना गया है, यह स्थिति भयावह आपदाओं को रोकने के लिए उपायों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट एक कठोर वैश्विक तस्वीर पेश करती है। वर्ष 2024 ने दशक की अभूतपूर्व गर्मी को चिह्नित किया है। अनवरत बढ़ती गर्मी हिमालय के ग्लेशियरों को खतरनाक गति से पिघला रही है, जिससे नई हिमनद झीलें बन रही हैं और मौजूदा झीलों का विस्तार हो रहा है। डब्ल्यूआईएचजी के अध्ययन में हिमनद झील विस्फोट बाढ़ के बढ़ते खतरे पर प्रकाश डाला गया है, जो पानी, तलछट और मलबे के विनाशकारी प्रवाह को पैदा कर सकती है। अतीत की त्रासदियां, जैसे 2013 में चोराबाड़ी झील के फटने से आई केदारनाथ बाढ़, जिसमें 6,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी तथा 2021 में सिक्किम में रैनी-तपोवन और 2023 में दक्षिण ल्होनक झील की बाढ़, इन घटनाओं की विनाशकारी शक्ति को दर्शाती हैं।
अपने विशाल बर्फ भंडार के कारण ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में जाना जाने वाला हिमालय बेहद संवेदनशील है। डब्ल्यूएमओ ने ग्लेशियरों के द्रव्यमान में तेजी से हो रही कमी को रेखांकित किया है, जिससे समुद्र का स्तर बढ़ रहा है तथा गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों पर निर्भर लाखों लोगों के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर खतरा है। उत्तराखंड की लगभग 350 हिमनद झीलें इस जोखिम को बढ़ाती हैं, जिनमें से पांच को उच्च जोखिम वाली ‘श्रेणी ए’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ढीले मलबे से बनी ये हिमनद झीलें विशेष रूप से अस्थिर होती हैं।
जैसा कि हम जानते हैं, जलवायु परिवर्तन पूरे एशिया में चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ा रहा है। डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में तीव्र हीटवेव, तूफान और बाढ़ का भारत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। जलवायु परिवर्तन संचार पर येल प्रोग्राम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में 71 फीसदी भारतीयों ने गंभीर हीटवेव का एहसास किया, जबकि आधे से अधिक लोगों ने सूखा, जल प्रदूषण या कृषि हानि का सामना किया। जलवायु परिवर्तन के कारण केरल में वायनाड भूस्खलन जैसी घटना, जिसमें 220 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, में दस फीसदी अधिक वृद्धि हुई। हिमालय में अनियमित मानसून और ऊंचाई पर बादल फटने की घटनाएं-जो कभी दुर्लभ थीं-अब अधिक होने लगी हैं, जिससे हिमनद झीलें भर गई हैं और उनकी नाजुक हिमोढ़ दीवारें अस्थिर हो गई हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मानवीय और आर्थिक क्षति बहुत होती है। आपदा रोधी बुनियादी ढांचा गठबंधन का अनुमान है कि वैश्विक बुनियादी ढांचा नुकसान का 70 फीसदी (प्रतिवर्ष 800 अरब डॉलर) जलवायु से संबंधित है तथा भारत जैसे देश इससे असमान रूप से प्रभावित हैं। उत्तराखंड में हिमनद झील विस्फोट से बाढ़ जीवन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, जैसे जल विद्युत संयंत्रों, सड़कों और पुलों के लिए घातक हैं, जैसा कि 2021 की चमोली आपदा में देखने को मिला। खासकर नीचे की ओर स्थित जल विद्युत परियोजनाएं अचानक आने वाली बाढ़ और मलबे के कारण अधिक संवेदनशील हैं। यदि तत्काल कार्रवाई नहीं की गई, तो तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने पर ऐसी घटनाएं और ज्यादा होने लगेंगी। चुनौतियों के बावजूद समन्वित कार्रवाई से उम्मीद बनी हुई है। डब्लूआईएचजी, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान सहित एक बहु-एजेंसी टास्क फोर्स तेजी से प्रयास कर रही हैं। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकारण की इस वर्ष पिथौरागढ़ जिले में चार उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों के सर्वे की योजना है।
झील के जल स्तर को कम करने के लिए पाइप लगाने या पूर्व चेतावनी प्रणाली तैनात करने जैसी रणनीतियों पर काम हो रहा है। हालांकि, 2023 की सिक्किम बाढ़ ने मौजूदा चेतावनी प्रणालियों की खामियों को उजागर किया था। दूरदराज की झीलों की निगरानी जटिल है। यह मुद्दा उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, क्योंकि 2011 से 2024 तक हिमालय क्षेत्र में हिमनद झीलों का विस्तार 10 फीसदी से अधिक हुआ है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तत्काल निगरानी और जोखिम कम करने के उपाय नहीं किए गए, तो बार-बार आपदाओं का सामना करना पड़ेगा, जिससे जीवन और बुनियादी ढांचे को खतरा है। हमें इस क्षेत्र के भविष्य की सुरक्षा के लिए ऐसे बुनियादी ढांचे को 'नहीं' कहना होगा, जो उभरते पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में नहीं रखते, चाहे राजनीतिक मजबूरियां कुछ भी हों, प्लास्टिक कचरे और अनियमित पर्यटन को भी 'नहीं' कहना होगा। उपग्रह डाटा, भूकंपीय निगरानी और स्थानीय ज्ञान को एकीकृत करने से हिमनद झील विस्फोट बाढ़ के जोखिम आकलन में सुधार हो सकता है। सामुदायिक जागरूकता और लचीला बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण है।
साफ है कि जलवायु परिवर्तन एक प्रणालीगत खतरा है, तो उसके लिए प्रणालीगत समाधान की ही जरूरत है। जलवायु परिवर्तन पर भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना में शमन के साथ-साथ अनुकूलन को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए, साथ ही लचीले आवास, जल संरक्षण और पूर्व चेतावनी प्रणालियों में निवेश करना चाहिए। ग्लेशियरों के पिघलने की गति को धीमा करने के लिए उत्सर्जन में कटौती करने और नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने के लिए विश्व मौसम विज्ञान संगठन का आह्वान आवश्यक है। ज्ञान और संसाधनों के साथ निचले समुदायों को सशक्त बनाना जरूरी है, ताकि उनके जीवन को बचाया जा सके।
हिमालय को ‘टिक टिक करता टाइम बम’ कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। पूर्व चेतावनी प्रणालियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग तक, प्रणालीगत समाधानों की मांग जरूरी और कार्रवाई योग्य, दोनों हैं। हिमालय लाखों लोगों की जीवन-रेखा है और हिमनद झीलों में हो रही बढ़ोतरी एक चेतावनी है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।