फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मुद्दा : अब दिखने लगी हैं एससीओ की दरारें, सदस्यों के पाखंड का प्रतिकार है भारत का 'इनकार'

केएस तोमर
Updated Mon, 30 Jun 2025 07:21 AM IST

सार

भारत ने एससीओ और उसके सदस्यों को याद दिलाया है कि क्षेत्रीय एकता चुनिंदा नैतिक मानकों पर नहीं बनाई जा सकती।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
एससीओ सम्मेलन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह। - फोटो : PTI


 रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की कड़े शब्दों में कूटनीतिक टिप्पणी स्पष्ट रूप से और सोची-समझी रणनीति थी, जिसके मुख्य निशाने पर पाकिस्तान था, लेकिन इसके जरिये एससीओ के उन सदस्य देशों पर भी निशाना साधा गया, जो पाकिस्तान को बचाने या उसे सही ठहराने की कोशिश करते रहते हैं। इस निर्णय का क्षेत्रीय भू-राजनीति, भारत के कूटनीतिक संदेश और इस समूह के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। वैश्विक आतंकी नेटवर्क के युग में, भारत अपने साझेदारों से (चाहे वे क्षेत्रीय हों या वैश्विक) अपनी बात पर अमल करने की अपेक्षा रखता है। यह दृष्टिकोण भारत के हालिया कूटनीतिक व्यवहार से मेल खाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परंपरा को तोड़ने और कूटनीतिक आत्मसंतुष्टि को चुनौती देने में लगातार तत्परता दिखाई है, भले ही इसका मतलब कुछ मंचों पर अलग-थलग पड़ना हो। ऐसा करके, भारत खुद को उसूलों वाली ताकत के रूप में स्थापित कर रहा है, न कि केवल प्रतिष्ठा चाहने वाली ताकत के रूप में।


 भारत के रुख का असर एससीओ से परे भी है। इसने एशिया में बहुपक्षीय सहयोग को लेकर अपेक्षाओं को फिर से संतुलित किया है। एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत के बढ़ते कद का मतलब है कि उसके फैसले दमदार हैं, और एससीओ के संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करना कूटनीति में ईमानदारी के लिए एक नया मानदंड स्थापित करता है। संयुक्त वक्तव्य से किनारा करके भारत ने एससीओ और उसके सदस्यों को याद दिलाया है कि क्षेत्रीय एकता चुनिंदा नैतिक मानकों पर नहीं बनाई जा सकती। भारत अब मूक भागीदार बनकर संतुष्ट नहीं है। वह निष्पक्षता, पारस्परिकता और सुरक्षा खतरों के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण की मांग कर रहा है। हालांकि यह निर्णय एससीओ के भीतर अल्पकालिक तनाव पैदा कर सकता है, लेकिन यह रणनीतिक स्पष्टता में दीर्घकालिक निवेश है। ऐसे समय में, जब आतंकवाद दक्षिण और मध्य एशिया के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, और जब भू-राजनीतिक माहौल और भी जटिल होता जा रहा है, भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता न करने का फैसला करके स्पष्ट संदेश दिया है कि संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। विडंबना देखिए कि संयुक्त वक्तव्य के मसौदे में पाकिस्तान के भीतर आतंकी हमलों का जिक्र तो था, लेकिन पहलगाम त्रासदी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। मसौदे की भाषा, कथित तौर पर चीन और पाकिस्तान से प्रभावित थी, जिसमें भारतीय सुरक्षा हितों को कम करके आंका गया, जबकि पाकिस्तान को आतंकवाद के शिकार के रूप में पेश किया गया।


यह कथात्मक उलटफेर, जिसमें पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को लगातार प्रायोजित करने की अनदेखी की गई, भारत को अस्वीकार्य था। यह कदम इस्लामाबाद व बीजिंग के लिए एक झटका है और बहुपक्षीय समूहों के भीतर भारत के पहले के रुख से भी स्पष्ट रूप से अलग है। वर्तमान रणनीतिक रुख के तहत, भारत उसूलों की खातिर औपचारिकता को तोड़ने के लिए तैयार है, जो परिपक्व कूटनीति का संकेत है। इस घटना ने एससीओ के भीतर एकता की कमजोरी को उजागर कर दिया है। अब उसके भीतर इतने गहरे अंतर्विरोध उभर रहे हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आतंकवाद पर दोहरे मानकों के कारण एससीओ की बुनियाद यानी सुरक्षा सहयोग को कमजोर किया जा रहा है। भारत की अनदेखी ने एससीओ को कूटनीतिक जांच के दायरे में ला दिया है। यदि संगठन आतंकवाद के सभी रूपों की आलोचना के लिए नैतिक और राजनीतिक स्पष्टता नहीं जुटा सकता है, तो इसकी प्रासंगिकता सवालों के घेरे में आ जाती है। इसके अलावा, यह दरार चीन की उस महत्वाकांक्षा को भी चुनौती देती है कि वह एससीओ को पश्चिमी नेतृत्व वाले मंचों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्थापित करे। अगर आंतरिक मतभेद बढ़ते रहे, तो एससीओ एक कार्यशील सुरक्षा तंत्र के बजाय विवादों का मंच बनकर रह जाएगा। एससीओ के संस्थागत विकास में भारी निवेश करने वाले चीन के लिए यह घटना एक झटका है।


बहुपक्षीय मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव न डालने का बीजिंग का रणनीतिक निर्णय अब बखूबी जांच के दायरे में है। भारत का दृढ़ रुख एशिया के दो दिग्गजों के बीच रणनीतिक मतभेद को भी रेखांकित करता है। एससीओ को या तो एक वास्तविक सुरक्षा समूह के रूप में विकसित होना चाहिए या फिर अप्रासंगिक होने का जोखिम उठाना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next