हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र आज जलवायु परिवर्तन के सबसे तीव्र प्रभावों का सामना कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर हर साल औसतन 34 मीटर पीछे हट रहा है। पिछले 25 वर्षों में यह लगभग 850 मीटर तक सिकुड़ चुका है। ग्लेशियर पिघलने से एक ओर जहां ग्रीष्म ऋतु में जल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है, वहीं ग्लेशियरों के नीचे बन रही झीलें (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) गंभीर खतरा बन चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, हिमालय क्षेत्र में तेजी से बदलती बर्फमंडली (क्रायोस्फीयर) का प्रभाव, नीचे की ओर स्थित समुदायों पर गंभीर रूप से पड़ेगा, जो इस पर सीधे तौर पर निर्भर हैं।
उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में आई आपदा में करीब 36 करोड़ क्यूबिक मीटर मलबा और पानी एकसाथ नीचे आया। यह क्लासिक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की स्थिति है। इससे सड़कें टूट गईं, संचार बाधित हो गया और राहत कार्यों में बाधा आई। सेना ने ड्रोन, हेलिकॉप्टर और रस्सी के सहारे कई लोगों को बचाया, पर आपदा का प्रभाव बहुत व्यापक था।
इसके कई कारणों में मुख्य रूप से भारी बारिश, बादल फटना, और पहाड़ों का कमजोर होना शामिल है। इसके अलावा, गंगोत्री घाटी में वनों की कटाई और अनियंत्रित विकास भी स्थिति को भयावह बनाते हैं। बीते कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्र में सड़कें, सुरंगें और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स तेजी से बन रहे हैं। पहले लोग पहाड़ियों की ऊपरी सतह पर गांव बसाते थे, ताकि बाढ़ या भूस्खलन से बच सकें। लेकिन अब सड़क की पहुंच और आधुनिक जीवनशैली की मांग ने यह पैटर्न उलट दिया है। अधिकतर निर्माण नदियों के किनारे और निचले इलाकों में किए जा रहे हैं। बिना भूगर्भीय सर्वेक्षण के पहाड़ों को काटा जा रहा है। इससे भूमि की स्थिरता कमजोर हो रही है और आपदाओं की आशंका कई गुना बढ़ गई है।
हिमालय की निचली सतह पर मौजूद ग्लेशियर जब पिघल जाता है, तो उसका मलबा वहीं बना रहता है। बादल फटने की स्थिति में पानी का तेज बहाव अपने साथ ग्लेशियर के मलबे को भी बहाकर ले आता है और वही तबाही का असली कारण बनता है।
मानसून के पैटर्न में बदलाव के चलते अब बारिश की तीव्रता और समय, दोनों अनिश्चित होते जा रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं 20 फीसदी तक बढ़ी हैं। हिमालयी क्षेत्रों के लिए भारी बारिश अधिक खतरनाक है, क्योंकि यहां की ढलानें और अस्थिर मिट्टी जल-दबाव को झेलने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। 2024-25 में हिमालयी राज्यों में बादल फटने, लैंडस्लाइड और बाढ़ की 100 से अधिक घटनाएं दर्ज हुई हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों के जलग्रहण क्षेत्र का लगभग 15 फीसदी हिस्सा नदी की मंड़ाई व भूस्खलन से बने मलबे से बनता है, जो विकास कार्यों के लिए अनुपयुक्त है। हमारे पूर्वजों ने भी इन स्थलों पर कभी निर्माण नहीं किया, लेकिन अब काफी अतिक्रमण हो रहा है।
हिमालय में बांध बनाना और सुरंग खोदना बेहद खतरनाक है, क्योंकि उत्तराखंड और हिमाचल का पहाड़ी इलाका भूगर्भीय रूप से कमजोर है और भूस्खलन की आशंका हमेशा बनी रहती है। यूरोप के पहाड़ अपेक्षाकृत कम ऊंचे और चट्टानी हैं, जिससे वहां सुरंग निर्माण संभव है, पर हिमालय में यह विनाशकारी हो सकता है। इसके बावजूद विकास की अंधी दौड़ और टूरिज्म लॉबी के दबाव में प्राकृतिक असंतुलन की अनदेखी हो रही है।
प्राकृतिक आपदाओं को कोई नहीं रोक सकता, लेकिन इससे होने वाले भारी नुकसान को कम करना हमारे हाथ में है। इसके लिए सरकार और हिमालयी रेंज में रहने वाले लोगों को खुद ही आगे बढ़ना होगा। सर्वप्रथम जिन इलाकों में पहले बाढ़ या भूस्खलन की घटनाएं हो चुकी हैं, उन्हें रेड जोन घोषित कर निर्माण कार्य पूरी तरह से रोका जाए। घटनाओं की पूर्व चेतावनी देने वाले सिस्टम का विकास और स्थानीय प्रशासन को उनका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जोखिमों को लेकर जनता को जागरूक करना जरूरी है।
उत्तराखंड और हिमाचल में पर्यटकों की भीड़ और हादसों पर नियंत्रण के लिए भूटान मॉडल अपनाने की सिफारिश की गई है। इसमें पर्यटकों से भी प्रति रात शुल्क लिया जाता है, निजी वाहन की अनुमति नहीं होती, स्थानीय टैक्सी, गाइड, तय होटल और भोजन व्यवस्था अनिवार्य होती है। इससे पर्यटन सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील बन सकता है।
संवेदनशील क्षेत्रों की भू-स्थानिक तकनीकों से पहचान कर इन्हें 'लाल क्रॉस' से चिह्नित किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को भविष्य की आपदाओं से बचाया जा सके। आपदा जोखिम न्यूनीकरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की भूमिका लगातार बढ़ रही है। चरम घटनाओं के पूर्वानुमान और जोखिम मानचित्रों के विकास से लेकर वास्तविक समय में घटनाओं का पता लगाने, लोगों को परिस्थितिजन्य जागरूकता प्रदान करने और निर्णय लेने में सहायता तक, ये सभी कार्य इसमें शामिल हैं।
इसके अलावा, पहाड़ों के पर्यावरण की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपी जाए। उनमें आज भी प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आध्यात्मिक संवेदना मौजूद है। उन्हें विकास के निर्णय में ज्यादा हिस्सेदारी देनी चाहिए, ताकि क्षेत्र का सर्वांगीण, समतापूर्वक और प्रकृति अनुरूप विकास हो सके। वन पंचायत जैसी व्यवस्था को और प्रगाढ़ करने की आवश्यकता है।
हिमालय भारत की जलवायु, संस्कृति और जैव विविधता का आधार है। लेकिन आज यह क्षेत्र विकास की आंधी, जलवायु परिवर्तन और हमारी अनदेखी की वजह से पिस रहा है। धराली जैसी घटनाएं बताती हैं कि अगर अब भी हम नहीं सुधरे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय सिर्फ किताबों में बचेगा। हमें विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही होगा। यही एकमात्र रास्ता है प्रकृति के कोप से खुद को बचाने का।