वहीं, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत ने अपना तीसरा सबसे अधिक औसत न्यूनतम तापमान दर्ज किया। उत्तर-पश्चिम भारत में अक्तूबर में सबसे अधिक विसंगति दर्ज की गई, जबकि औसत न्यूनतम तापमान सामान्य से 2.25 डिग्री सेल्सियस अधिक था। समझना होगा कि इस तरह असामान्य तपन के कुप्रभाव केरल में गत पांच वर्षों से कई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ रहे हैं। इस बार हिमाचली राज्यों में तो अक्तूबर-नवंबर और दिसंबर के पहले दो हफ्तों में एक बूंद पानी नहीं बरसा और इसका विपरीत असर जंगल, खेत, जानवर और इन्सानों पर दिख रहा है।
हमारी धरती को प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से गरमी मिलती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरते हुए पृथ्वी की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है, जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर धरती के ऊपर एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस तरह धरती को गरम बनाए रखता है। इन्सानों, दूसरे प्राणियों और पौधों को जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी मोटा होता जाता है। ऐसे में, यह आवरण सूर्य की ज्यादा किरणों को रोकने लगता है और इससे धरती का परिवेश जरूरत से अधिक गरम हो जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इन गैसों का उत्सर्जन अगर इसी प्रकार चलता रहा तो 21वीं शताब्दी में पृथ्वी का तापमान 3 से 8 डिग्री तक बढ़ सकता है। विश्व के कई हिस्सों में बिछी बर्फ गल जाएगी, इससे जल का आगमन बढ़ेगा और समुद्र का जलस्तर कई फुट ऊपर तक बढ़ जाएगा। समुद्र के इस बर्ताव से विश्व के कई हिस्से जलमग्न हो जाएंगे। औद्योगीकरण के साथ ही सौ सालों के दौरान सन 1900 से 2000 तक पृथ्वी का औसत तापमान एक डिग्री फैरेनहाइट बढ़ गया है। सन 1970 के मुकाबले आज धरती का तापमान तीन गुणा तेजी से बढ़ रहा है। इस बढ़ती वैश्विक गर्मी का असल कारण इन्सान व उसकी भौतिक सुविधाओं की जरूरतें ही हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन, गाड़ियों से निकलने वाला धुआं और जंगलों में लगने वाली आग इसकी मुख्य वजहें हैं। इसके अलावा, घरों में लग्जरी वस्तुएं मसलन एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, ओवन आदि भी इस गर्मी को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। बिजली घर से 21.3 प्रतिशत, कारखानो से 16.8 , यातायात और वाहनों से-14, खेती के उत्पादों से 12.5, जीवाश्म ईंधन से 11.3, आवासीय क्षेत्रों से 10.3, खेतों से निकले बॉयोमॉस जलने से 10 और कचरा जलाने से 3.4 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
सन 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण में ही यह बात कह दी गई थी कि धरती का तापमान अधिक होने पर हमारी खेती-किसानी ध्वस्त हो सकती है। यदि तापमान एक डिग्री-सेल्सियस बढ़ता है, तो खरीफ मौसम के दौरान किसानों की आय 6.2 फीसदी कम कर देता है और असिंचित जिलों में रबी मौसम के दौरान 6 फीसदी की कमी करता है। इसी तरह बारिश में औसतन 100 मिमी की कमी होने पर किसानों की आय में 15 फीसदी और रबी के मौसम में 7 फीसदी की गिरावट होती है। साथ ही कई बीमारियां भी बढ़ती हैं।
यह बात भी डराने वाली है कि वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस समय विश्व का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2100 तक इसमें डेढ़ से छह डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है। एक चेतावनी यह भी है कि यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तत्काल बहुत कम कर दिया जाए, तो भी तापमान में वृद्धि तत्काल रुकने की संभावना नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पर्यावरण और पानी की बड़ी इकाइयों को इस परिवर्तन के हिसाब से बदलने में भी सैकड़ों साल लग जाएंगे। अब यह इन्सान पर निर्भर है कि अपनी आगामी पीढ़ियों को बेहतर धरती देने के लिए वह किस तरह अपनी लिप्सा और भौतिक सुखों की चाहत के बनिस्पत स्वस्थ्य पर्यावरण को महत्व देता है।