कुछ दिनों पहले जब मैं राजग सरकार की पहली वर्षगांठ के मौके पर एक टीवी चैनल द्वारा आयोजित दिन भर के कार्यक्रम में शामिल था, तब सड़क परिवहन, राजमार्ग और पोत-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की योजना सुनकर हैरान रह गया। उन्होंने विस्तार से कहा कि यह बस कुछ ही समय की बात है, जब लोग होवरक्राफ्ट्स और क्रूज लाइनर के जरिये गंगा पार करेंगे। मैं यह सुनकर हतप्रभ रह गया, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में मैं कई मौकों पर ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कानपुर, वाराणसी और कोलकाता जैसी विभिन्न जगहों पर गंगा नदी के घाट पर गया हूं। हर मौके पर मुझे गंगा के तट पर गंदगी, नदी में सीवेज का कचरा गिराते, गंदे और अपर्याप्त पानी देखने को मिले। मैं इस बात से हैरान हूं कि क्या नदी को स्वास्थ्यप्रद और प्रदूषण मुक्त बनाने से ज्यादा जरूरी उसे पर्यटन स्थल बनाना है!
मुझे याद आया कि यह पहली बार नहीं है, जब गडकरी ने जलमार्ग बनाने की महत्वाकांक्षी योजना की बात की है। इससे पहले भी उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार यमुना में दिल्ली से आगरा के बीच होवरक्राफ्ट चलाने की संभावना खोज रही है। गडकरी ने कहा था कि सरकार ने नीदरलैंड से इस मुद्दे पर बातचीत की थी कि क्या नदी के दोनों किनारों पर बैराज और रिवर टर्मिनल बनाए जा सकते हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि सरकार ने एक ब्रिटिश कंपनी के साथ रक्षा मंत्रालय के गोवा शिपयार्ड में होवरक्राफ्ट बनाने के लिए बात कर ली है। अगर मेक इन इंडिया का यही मतलब है, और वह भी रक्षा सुविधाओं को लेकर, तो मैं हैरान हूं; हालांकि वह अलग विषय है।
होवरक्राफ्ट या दूसरे लक्जरी बोट में सफर का किराया हवाई जहाज या मेट्रो जैसे अन्य आभिजात्य किस्म की अंतरनगरीय परिवहन सेवाओं की तरह होगा, जो बस या लोकल ट्रेनों की तुलना में ज्यादा महंगा होगा। सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन सिर्फ उनकी नीतियों या कार्यक्रमों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं के आधार भी पर होता है। कोई उस सरकार का आकलन कैसे करे, जो नदी को प्रदूषण मुक्त किए बिना विदेशी पर्यटकों या समृद्ध भारतीयों के लिए यमुना में एक बेहतरीन परिवहन सुविधा की शुरुआत करना चाहती है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह नितिन गडकरी को भी वैसे कार्यक्रम पसंद हैं, जिनके जरिये अपनी छवि चमकाने का मौका मिले। मुंबई के फ्लाईओवरों का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है, जिन्होंने न केवल उस महानगर के प्रति लोगों का नजरिया बदला है, बल्कि वहां की परिवहन प्रणाली को भी आसान बना दिया है। लेकिन भारत के हर हिस्से को उन देशों की तर्ज पर तो विकसित नहीं किया जा सकता, जहां की ग्रामीण एवं शहरी संरचना अलग है, और जहां के ग्रामीण क्षेत्र भी हमारे गांवों की तुलना में विकसित और समृद्ध हैं। इसके बावजूद हमारे यहां विकास कार्यक्रमों को मेक इन इंडिया के मुताबिक चलाना होगा!
मुझे गंगा या यमुना पर होवरक्राफ्ट चलाने का विचार शानदार लगा, लेकिन यह विज्ञान कथा की लेखन प्रतियोगिता की पृष्ठभमि के तौर पर ही ठीक है। इसके बावजूद मैं चुप रहा, तो इस डर से कि जुबान खोलने पर मुझे नाहक ही आलोचक मान लिया जाएगा। लेकिन देश के दो-दो प्रधानमंत्रियों को पढ़ा चुके भौतिकशास्त्र के एक प्रोफेसर (डॉ मुरली मनोहर जोशी) ने जब सरकार की योजना की आलोचना की, तब मैं भी इस पर कुछ कहने का साहस जुटा पाया।
यह बिल्कुल संभव है कि डॉ. मुरली मनोहर जोशी को सरकार की आलोचना करने का दोषी ठहराया जाए, क्योंकि उन्हें सरकार या संगठन में कोई पद नहीं दिया गया है। यह सच है कि डॉ. जोशी को लालकृष्ण आडवाणी के साथ मार्गदर्शक मंडल में रखा गया है, लेकिन गठन के बाद से न इस मंडल की बैठक हुई है, न ही इन्होंने मार्गदर्शन किया है। करीब महीने भर पहले अरुण शौरी ने भी एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री पर अति केंद्रीकृत सरकार चलाने और उन नीतियों पर अमल करने का आरोप लगाया था, जिनमें वास्तविक तथ्य के बजाय चमत्कार ज्यादा हो। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सरकार की आलोचना के एजेंडे में ये दोनों मिले हुए हैं, क्योंकि जहां तक मुझे जानकारी है, वाजपेयी सरकार में ये दोनों अलग-अलग पाले में थे।
इसके बावजूद दोनों की आलोचना में एक चीज समान है-वह यह कि सरकार योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा लोगों को प्रभावित करने के लिए ज्यादा करती है, जमीनी काम करने के लिए कम। धारणा की लड़ाई जीतना प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं में शीर्ष पर है, इसका पता सोशल मीडिया में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की उनकी कोशिशों से भी चलता है। नरेंद्र मोदी ने फरवरी, 2009 में ट्वीटर जॉइन किया, और एक पखवाड़े के बाद अपनी वेबसाइट का हिंदी संस्करण शुरू किया। वह ट्वीटर का शानदार इस्तेमाल तब करते हैं, जब उन्हें लगता है कि वर्चुअल दुनिया में उनके ट्वीट का व्यापक असर पड़ेगा। जब वह प्रधानमंत्री बने, तब उनके चालीस लाख से भी अधिक फॉलोवर थे, और अब फॉलोवर्स की संख्या उसकी लगभग तीन गुनी है। ट्वीटर पर वह दूसरे सबसे अधिक फॉलो करने वाले प्रधानमंत्री हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके पास विशाल तकनीकी टीम है।
अरुण शौरी और डॉ. जोशी की आलोचना में एक और चीज समान है-वह यह कि नरेंद्र मोदी अब भी चुनाव अभियान के मूड में हैं। चुनाव के समय खुद को मजबूती के साथ रखने की बात तो ठीक है, पर सरकार चलाते हुए यह सही रणनीति नहीं है। प्रधानमंत्री को उनके पुराने साथी अगर एक या दो चीजें बता रहे हैं, तो उन्हें सुन लेने में कोई हर्ज नहीं है। जब तक चीजें नहीं बिगड़ी थीं, तब तक अरुण शौरी उनके पसंदीदा लोगों में थे। जबकि भाजपा अध्यक्ष रहते हुए डॉ. जोशी ने ही नरेंद्र मोदी को एकता यात्रा के प्रबंधन का जिम्मा सौंपते हुए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता के प्रदर्शन का पहला मौका दिया था।
-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक