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मुद्दा: स्वच्छ हवा, वादे और वित्तीय मकड़जाल; भारत जैसे देशों पर क्यों पड़ रहा है प्रदूषण का सबसे बड़ा बोझ?

कुमार सिद्धार्थ
Updated Sat, 07 Feb 2026 07:19 AM IST

सार

अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसियां स्वच्छ हवा के लिए वादे तो करती हैं, लेकिन उनका धन उन्हीं परियोजनाओं में जा रहा है, जो हवा को और जहरीला बना रही हैं।
 
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प्रदूषण - फोटो : Adobe Stock Photo


रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 के दौरान दुनिया की सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने जीवाश्म ईंधन को लंबे समय तक बनाए रखने वाली परियोजनाओं में वित्तीय राशि 80 फीसदी बढ़ाकर 9.5 अरब डॉलर कर दी। इसके उलट, स्वच्छ हवा और वायु गुणवत्ता सुधार के लिए दी जाने वाली सहायता घटकर 3.7 अरब डॉलर रह गई, जो कुल वैश्विक विकास सहायता का महज एक फीसदी ही है। हर साल होने वाले अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन स्वच्छ हवा को मानवाधिकार के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन जब बजट आवंटन की बात आती है, तो वही सरकारें और संस्थाएं पीछे हट जाती हैं। स्थिति और गंभीर तब हो जाती है, जब दुनिया की सबसे बड़ी विकास एजेंसी यूएसएड के बंद होने और विश्व बैंक पर जीवाश्म ईंधन ऋण बढ़ाने के दबाव जैसी घटनाएं सामने आती हैं। इन फैसलों ने स्वच्छ हवा के लिए चल रहे वैश्विक प्रयासों की रीढ़ कमजोर कर दी है।


आज वायु प्रदूषण दुनिया भर में हर साल लगभग 57 लाख लोगों की जान ले रहा है। यह संख्या 2040 तक 62 लाख तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि स्वच्छ हवा के लिए उपलब्ध सीमित वित्तीय अनुदान का वितरण बेहद असमान है। जिन इलाकों में स्वास्थ्य ढांचा सबसे कमजोर है, वहीं मदद सबसे कम पहुंच रही है। भारत इस वैश्विक असमानता का सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में भारत के शहर लगातार ऊपर बने हुए हैं। फिर भी भारत को स्वच्छ हवा के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में प्राथमिकता नहीं मिलती।


भारत में वायु प्रदूषण से हर साल करीब 95 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति होती है। यह नुकसान केवल अस्पतालों के बढ़ते खर्च में नहीं दिखता, बल्कि काम के दिनों की हानि, स्कूल न जा पाने वाले बच्चों, घटती उत्पादकता और जीवन की गिरती गुणवत्ता के रूप में सामने आता है। अगर वैश्विक वित्तीय सहायता जीवाश्म ईंधन आधारित परियोजनाओं पर ही केंद्रित रही, तो भारत का स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और धीमा पड़ेगा। कोयला आधारित बिजली संयंत्र, डीजल आधारित परिवहन और प्रदूषणकारी उद्योग न केवल जलवायु संकट को गहराएंगे, बल्कि भारत को एक स्थायी स्वास्थ्य आपदा की ओर धकेल देंगे।


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2040 तक मानवजनित वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को आधा करने का लक्ष्य रखा है। जी-20 ने भी वायु गुणवत्ता को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। लेकिन जब तक नीतियों और बजट के बीच की यह खाई बनी रहेगी, तब तक कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं होगा। क्लीन एयर फंड की रिपोर्ट समाधान का रास्ता भी सुझाती है कि फंडिंग को जीवाश्म ईंधन के विस्तार से हटाकर स्वच्छ हवा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और न्यायपूर्ण ऊर्जा संक्रमण की ओर मोड़ा जाए। अगर दाता देश, विकास बैंक और वैश्विक संस्थाएं अब भी अपनी दिशा नहीं बदलतीं, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन और जी-20 के लक्ष्य केवल खोखले घोषणापत्र बनकर रह जाएंगे।
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