गौरतलब है कि शेख हसीना के नेतृत्व वाले पिछले तीन कार्यकालों में बांग्लादेश में उल्लेखनीय आर्थिक विकास हुआ है। यह दक्षिण एशिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है और फिलवक्त यह क्षेत्र की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो केवल भारत से पीछे है। कुछ रिपेार्ट यह तक बताती हैं कि बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय क्षेत्र में सबसे ज्यादा है और विभिन्न सामाजिक संकेतकों पर भी इसने अपनी स्थिति सुदृढ़ की है।
हालांकि, वर्तमान में बांग्लादेश कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा है, जिनकी वजहों पर उसका कोई काबू नहीं है। इसके लिए कुछ हद तक कोविड और रूस- यूक्रेन युद्ध को जिम्मेदार माना जा सकता है। चूंकि, प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं भी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, इसलिए इसके निर्यातों में भी कमी आई है।
दरअसल, छोटी अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति तब और खराब हो गई, जब कोविड के लंबे चले दौर और रूस-यूक्रेन संघर्ष से पैदा हुई रिकॉर्ड महंगाई की स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका ने नीतिगत दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की। इस कदम ने निवेशकों को एशियाई बाजारों से हटने के लिए प्रेरित किया, जिससे इनमें से कई अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा का अवमूल्यन हुआ, जिससे महंगाई बढ़ी।
अमेरिकी डॉलर की तुलना में बांग्लादेशी टाका का मूल्य करीब 25 फीसदी तक कम हो गया है। छह जुलाई, 2023 तक, बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार 2022 में 41.8 अरब डॉलर से घटकर 29.97 अरब डॉलर हो चुका था। पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 28 फीसदी की इस गिरावट का श्रेय विदेशी मुद्रा बाजार में चल रही चुनौतियों को दिया गया है, जो मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर की कमी से उपजी हैं।
बांग्लादेश में डॉलर संकट, निर्यात से होने वाली आय की तुलना में आयात खर्चों के बढ़ने की वजह से उभरा है। नतीजतन, बांग्लादेश को ईंधन के आयात की अपनी जरूरतों के लिए पैसा जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, भारत ने महामारी के दौरान उद्योगों के लिए आवश्यक वस्तुओं और कच्चे माल की आपूर्ति करके बांग्लादेश को पूरा समर्थन दिया था। लेकिन, बिगड़ती वैश्विक आर्थिक स्थितियों ने बांग्लादेश पर भी प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। यह सब तब सामने आ रहा है जब देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है।
अफसोस की बात है कि आर्थिक उथल-पुथल के इस दौर में बाइडन प्रशासन के लोकतांत्रिक तरीकों से पीछे हटने के आरोपों का सामना भी बांग्लादेश को करना पड़ रहा है। अमेरिका ने बांग्लादेश पर दबाव बनाने के लिए, पिछले चुनावों में शेख हसीना की अवामी लीग को सहायता देने के आरोपी अर्धसैनिक बल रैपिड ऐक्शन बटालियन (आरएबी) के कई वर्तमान और सेवानिवृत्त अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। इनमें से कुछ पर मानवाधिकार उल्लंघन का भी आरोप है।
पाकिस्तान, भारत और अन्य देशों को आमंत्रित करते हुए पिछले लोकतंत्र-केंद्रित शिखर सम्मेलनों से बांग्लादेश को बाहर करने और मई में विश्व बैंक की बैठक के लिए वाशिंगटन की यात्रा के दौरान शेख हसीना की उपेक्षा सहित बाइडन प्रशासन की कार्रवाइयों ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस संबंध में अमेरिका का नजरिया बदलता रहा है। इससे न केवल बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) बल्कि उसकी पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) का भी हौसला बढ़ा है।
एक परिप्रेक्ष्य यह भी है है कि बांग्लादेश की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण अमेरिका उसके साथ मजबूत रक्षा संबंध स्थापित करने में रुचि रखता है और इसलिए वह दबाव बना रहा है। अमेरिका पहले ही ढाका को छोटे नौसैनिक जहाज और सैन्य परिवहन विमान उपलब्ध करा चुका है। इसका उद्देश्य यह है कि बांग्लादेशी सरकार दो बुनियादी सैन्य समझौतों पर हस्ताक्षर कर दे। इन समझौतों से आपसी रक्षा सहयोग को बढ़ावा मिलने, दोनों देशों के बीच रक्षा-संबंधित व्यापार, सूचना विनिमय और सैन्य सहयोग के विस्तारित अवसरों की सुविधा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, बांग्लादेश ने इन समझौतों को अंतिम रूप देने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है।
दूसरी ओर, भारत ने अमेरिका द्वारा की गई कथित अस्थिर करने वाली कार्रवाइयों के संबंध में अमेरिका को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है जो एक पड़ोसी देश के रूप में भारत की समग्र सुरक्षा और व्यापक दक्षिण एशियाई क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं। भारत को आशंका है कि अगर जमात-ए-इस्लामी को रियायतें दी गईं, तो निकट भविष्य में ढाका में कट्टरवाद बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।
बहरहाल, भारत और अमेरिका के बीच एक आम समझ मौजूद है कि बांग्लादेश में जनवरी, 2024 में होने वाले आगामी आम चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष होने के सिद्धांतों को बरकरार रखना चाहिए। दोनों देशों का मानना है कि अवामी लीग को चीन समर्थक और इस्लाम समर्थक रुझान वाले नेताओं से दूरी बनाने की जरूरत है। इन संदेशों को अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री शेख हसीना को स्पष्ट रूप से बताए जाने की संभावना है, जहां वह जी-20 कार्यक्रमों में भाग लेंगी।
गौरतलब है कि जनवरी, 2009 में सत्ता संभालने के बाद से शेख हसीना की सरकार ने कट्टरवाद और आतंकवाद पर अंकुश लगाने में काफी प्रगति की है। बावजूद इसके, ऐसी आशंका है कि चीन, जो पहले से ही कई दक्षिण एशियाई देशों में महत्वपूर्ण मौजूदगी रखता है, बांग्लादेश में उभरते हालात का फायदा उठा सकता है। हालांकि, बांग्लादेश पर चीन का कर्ज कम है, इसलिए चीन के ऋण-जाल में उसके फंसने की आशंका भी कम है। लेकिन, नहीं भूलना चाहिए कि चीन, बांग्लादेश का एक प्रमुख निर्यातक और सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है और, जैसा कि उसने श्रीलंका में किया, वह राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का अपने हित में उपयोग करने के लिए कुख्यात है। अगर बीएनपी और जमात गठबंधन दोबारा सत्ता में आता है, तो बांग्लादेश में भी ऐसा ही परिदृश्य सामने आ सकता है।
-लेखक एमपी-आईडीएसए में एसोसिएट फेलो हैं।