करीब आठ महीने बाद कश्मीर मंडल एवं कश्मीर घाटी में स्कूल खुलने के बाद की तस्वीर पूरे देश को उत्साहित करने वाली है। छात्रों और उनके अभिभावकों के चेहरे की खुशी तथा उनके वक्तव्यों से लग रहा था कि वे महीनों से इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कश्मीर घाटी में पिछले वर्ष आठ जलाई को हिजबुल आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद तनावपूर्ण माहौल के कारण स्कूल बंद कर दिए गए थे। अलगाववादियों की ओर से जारी बंद की वजह से मुसीबतें बढ़ गई थीं। सड़कों पर पत्थरबाजी हुई, स्कूल जलाए गए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसका सर्वाधिक बुरा असर बच्चों पर पड़ा। स्कूल खुलते ही बच्चों ने सबसे पहले हुर्रियत को जवाब दिया। हुर्रियत के नेताओं का नाम लेकर छोटे-छोटे बच्चे कह रहे हैं कि जो करना है करें, पर शिक्षा को सियासत से दूर रखें। टीवी संवाददाताओं ने श्रीनगर के अलग-अलग स्कूलों में जाकर बच्चों तथा अभिभावकों से जो बात की, उससे हुर्रियत एवं आतंकवादियों को सही संदेश पहुंचा होगा। बच्चों ने हुर्रियत नेताओं से कहा कि पत्थर नहीं, पेन से बदलाव होता है। कलम चलेगी, तो भविष्य सुरक्षित होगा। क्या यह संदेश इस तरीके से अलगाववादियों और आतंकवादियों के बीच पहुंचेगा?
यह पहली बार नहीं है, जब अलगाववादियों एवं आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों को कश्मीर के छात्र-छात्राओं तथा उनके अभिभावकों ने जवाब दिया है। पिछले वर्ष नंबवर में भी कश्मीर के छात्रों ने बोर्ड परीक्षा में अपनी भारी उपस्थिति से उनको जवाब दिया था। सच कहा जाए, तो कश्मीर में छात्रों का बढ़-चढ़ कर परीक्षाओं में भाग लेना उन अलगाववादियों के मुंह पर तमाचा था, जिनके मंसूबे कश्मीर के युवाओं को गुमराह कर घाटी में हमेशा अशांति बनाए रखने के हैं।
श्रीनगर में पड़ रही कड़ाके की ठंड के बीच छात्रों ने व्यापक उत्साह दिखाया था। अलगाववादियों के बंद के चलते श्रीनगर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी नहीं मिल रहे थे। इसके बावजूद छात्र किसी तरह परीक्षा केंद्र पहुंचे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 12वीं की परीक्षा के लिए 94 प्रतिशत छात्र उपस्थित हुए। 12वीं में पढ़ रहे इकत्तीस हजार से ज्यादा छात्रों में से तीस हजार से ज्यादा छात्र उपस्थित हुए। दसवीं की परीक्षाएं एक दिन बाद शुरू हुईं, जिसमें कुल 50 हजार छात्रों ने भाग लिया। परीक्षाएं शांतिपूर्ण ढंग से निपट जाएं, इसके लिए सरकार ने सभी केंद्रों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए।
जिस तरह तालिबान ने अफगानिस्तान में स्कूल जलाए, पाकिस्तान के अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में जला रहे हैं, वैसे कश्मीर घाटी में भी किया गया। करीब तीन दर्जन ऐसे स्कूल जलाकर खाक कर दिए गए। उच्च न्यायालय ने स्कूलों में आग लगाए जाने की खबरों का स्वतः संज्ञान लिया था। इन सबका असर हुआ है।
अलगाववादियों, आतंकवादियों तथा इनका समर्थन करने वालों का निहित स्वार्थ उसी में है, जब कश्मीर में आम अवाम शिक्षा से वंचित रहे। ऐसे तत्व हर जगह ऐसा ही करते हैं। माओवादी अपने क्षेत्र के विद्यालयों को निशाना बनाते हैं। कश्मीर में शांति और स्थिरता की एक दवा यही है कि वहां की नई पीढ़ी को अच्छी शिक्षा दी जाए, ताकि वह स्वयं अपना भला और बुरा सोच सकें एवं किसी के बहकावे में न आए। छात्र-छात्राओं और अभिभावकों ने तो अपना पक्ष जता दिया है, इसके बाद मुख्य जिम्मेवारी केंद्र एवं राज्य सरकार की है कि वे इन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएं, ताकि दोबारा उन्हें उपद्रवियों के भय से पढ़ाई छोड़ घर न बैठना पड़े। सरकारें ऐसा नहीं कर पातीं हैं, तो यह विफलता उनकी होगी, लोगों की नहीं।