बचपन में हम देशवासी पंडित नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया करते थे। जब तक पंडित जी जीवित थे, 14 नवंबर को बच्चों को प्रधानमंत्री निवास में बुलाया जाता था और उनके बीच बैठकर प्रधानमंत्री तस्वीरें खिंचवाया करते थे। मेरी मां पंडित जी को भगवान मानती थीं, सो जब यें तस्वीरें अखबारों में छपती थीं, तो वह हमें अपने पास बैठाकर दिखाती थीं और बताती भी थीं कि पंडित जी कितने महान व्यक्ति हैं और भारत के लिए उन्होंने कितना कुछ किया है। इन बातों में से एक बात जो मुझे आज भी याद है, वह यह कि, 'अंग्रेजों का राज जब समाप्त हुआ था, तब इस देश में हम एक सुई तक नहीं बना पाते थे और आज देखो, अपनी जरूरत की सारी चीजें हम बना लेते हैं। इसके लिए हमें पंडित जी को रोज धन्यवाद करना चाहिए।’
पिछले सप्ताह उनकी जन्मतिथि पर किसी ने याद नहीं किया कि यह देश के बच्चों के लिए खास दिन हुआ करता था। ऐसा क्यों? क्या इसलिए कि पंडित जी ने बेशक भारत के लिए बहुत कुछ किया होगा, लेकिन बच्चों के मामले में हम यहां तक पहुंचे हैं कि आज भी इस देश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित माना जाता है? आज भी सरकारी स्कूलों का इतना बुरा हाल है कि जिन बदकिस्मत बच्चों को उनके मां-बाप की आर्थिक मजबूरियों के कारण इन पर निर्भर रहना पड़ता है, वे पूरी पढ़ाई करने के बाद भी अनपढ़ रहते हैं। इतना बुरा हाल है इन स्कूलों का कि पीआईएसए (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टुडेंट एसेसमेंट) नाम की अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में जब हम अपने बच्चों को भेजते हैं, तो एक या दो मामूली-गरीब देशों के बच्चे ही उनसे अनपढ़ साबित होते हैं। यह देख हमारी सरकार का सिर शर्म से ऐसा झुका कि हमने इस स्पर्धा में अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि मैं इस देश के बेहाल बच्चों का सारा दोष पंडित जी पर डाल रही हूं, लेकिन यह जरूर कहना चाहती हूं कि उन्होंने हमारे बच्चों में वास्तव में निवेश किया होता, तो आज शायद वे इतने बेहाल न होते। पिछले सप्ताह पंडित जी के प्रशंसकों ने उनकी इतनी प्रशंसा की कि यहां तक कहा गया कि अगर पंडित जी न होते, तो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और इस देश की एकता न होती। शायद यह सब काफी हद तक सच भी है, लेकिन काश, कि पंडित जी ने हमारे बच्चों में असली निवेश किया होता। काश, कि आज देश के बच्चों के लिए स्कूल इतने अच्छे होते कि वे दुनिया के बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकते। काश, कि उनके पोषण में कम से कम इतना निवेश हुआ होता कि स्कूल में उन्हें एक समय का खाना जी भरकर मिलता, जैसे आज कई राज्यों में अक्षयपात्र जैसी संस्थाओं के जरिये उनको मिलता है। काश, कि उनको पीने का पानी इतना प्रदूषित न मिलता। आज भी देश के बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जो गंदे पानी और गंदगी से फैलती हैं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू महान व्यक्ति थे, लेकिन यह शायद अच्छा ही है कि हमारी सरकार पिछले सप्ताह भूल गई थी कि उनकी जन्मतिथि हम कभी बाल दिवस के रूप में मनाया करते थे। यह इसलिए कि जितना उन्होंने इस देश के लिए किया, उतना इस देश के बच्चों के लिए नहीं किया। मेरा मानना है कि आज भी इस देश की सबसे बड़ी आवश्यकता हमारे बच्चों में निवेश करने की है। 14 नवंबर की शाम दिल्ली में बारिश हुई थी और उस बारिश में जब मैंने छोटे बच्चों को सड़कों पर भीगते-ठिठुरते खिलौने और फूल बेचते हुए देखा, तो दिल टूट-सा गया। जब भी अपने महानगरों में बच्चे देर रात काम करते दिखते हैं, तब दिल टूटता है।