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कहां गए आपदा में गुम बच्चे?

Mon, 15 Jul 2013 08:45 PM IST
अजय सेतिया
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य वी के दुग्गल ने पिछले दिनों केंद्र सरकार से शिकायत की कि उत्तराखंड सरकार में आपदा से निपटने के लिए किसी तरह का कोई समन्वय नहीं है। कुछ गैरसरकारी संगठनों के आंकड़े पर गौर करें, तो उत्तराखंड की आपदा में 11,600 लोग लापता हैं। लेकिन राज्य सरकार सिर्फ 5,728 पर अटकी है, जिन्हें अब मृत मान लिया गया है। केदारनाथ में तैनात कुछ अधिकारी आपको यह दावा करते मिल जाएंगे कि मृतकों की तादाद 18-20 हजार से ज्यादा है। इनमें बच्चे कितने हैं, अनुमान नहीं लगाया जा सकता। तीन जुलाई को महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव ने जब मीडिया को लापता बच्चों की संख्या 1,227 बताई, तो उस समय के आंकड़ों के हिसाब से आपदा में लापता हर चौथा व्यक्ति बच्चा था। पर एक बात ध्यान रखिए यह आंकड़ा तीर्थयात्रियों का है, स्थानीय लोगों का नहीं।
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सवाल यह भी है कि आपदाग्रस्त चार जिलों में कितने बच्चे मौत के मुंह में समाए। जो बच गए, उनमें से कितने अनाथ और कितने विकलांग हो गए। यह आंकड़ा आपदा के एक महीना बीत जाने के बाद भी उपलब्ध नहीं है। वैसे आंकड़ा तो तब मिलेगा, जब प्रशासन गांव में पहुंच पाएगा। जरूरत यह है कि बाल कल्याण समितियां सक्रिय हों, गांव-गांव जाकर बच्चों की सूची बनाएं और प्रशासन को सौंपेे। इस आपदा में राहत का सारा प्रबंधन विफल हो गया है। बच्चों के पुनर्वास की तो कोई योजना ही नहीं है राज्य में। दावे चाहे जितने किए जाएं, नौ जुलाई को ही बच्चों से जुड़े एनजीओ का पहला दल केदारनाथ पहुंच पाया था। पर आपदा क्या सिर्फ केदारनाथ या उसके मार्ग पर ही आई थी? चार जिलों का चप्पा-चप्पा आपदा से प्रभावित हुआ है।

रूद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, गढ़वाल, पिथौरागढ़ जैसे इलाके सर्वाधिक प्रभावित हैं। हजारों गांवों के घर, खेत इंद्रदेव बहा ले गए। टीवी चैनलों पर तो सिर्फ सड़क और नदियों के किनारे ढहते होटल ही दिखाई जा रहे थे। ये तो सिर्फ वे इलाके हैं, जहां तक खबरनबीसों की पहुंच संभव हुई। गांवों की सुध तो अभी तक किसी ने नहीं ली। आमतौर पर ऐसी आपदाओं में स्कूलों की इमारतें ग्रामीणों का आश्रय बनती हैं।
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शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, 21 स्कूलों की इमारतें तो पूरी तरह ढह गईं। दर्जनों स्कूल आंशिक तौर पर प्रभावित हुए। जो स्कूल प्रभावित हुए या ढह गए, उनमें छह हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ते थे। शुक्र है कि आपदा स्कूलों में छुट्टियों के समय आई। पर चारधाम यात्रा के जिस मार्ग पर आपदा आई, उस मार्ग पर बाल श्रम की शिकायतें भी कम नहीं। श्रम विभाग को शिकायतें पहुंचती हैं, पर वह लंबी तान कर सोता है। श्रम विभाग कितना भी दावा करे, स्थानीय लोगों का कहना है कि केदारनाथ की चढ़ाई में इस्तेमाल किए जाने वाले खच्चरों के साथ उस दिन भी सैंकड़ों बच्चे थे।

अटकलबाजी ठीक नहीं होगी, पर उत्तराखंड आपदा में बड़ी संख्या में बच्चे अनाथ हुए हैं। सरकार ने समय पर बच्चों की समेकित बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) लागू की होती, तो इस आपदा से निपटने का ढांचा पहले से तैयार होता। आईसीपीएस केंद्र सरकार की वह योजना है, जिसके अंतर्गत गांव से लेकर राज्य स्तर तक वंचित बच्चों के समग्र विकास, पुनर्वास का ढांचा खड़ा होता है। उत्तराखंड में हर साल आपदा आती है, हर साल तबाही मचती है, हर साल बच्चे अनाथ होते हैं। देश भर में केंद्र सरकार की आईसीपीएस योजना लागू है।

पांच साल पहले जबसे यह योजना लागू हुई है, देश में कई नए बाल गृह बन चुके हैं, पर उत्तराखंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी आईसीपीएस की फाइल वर्षों से दबी पड़ी है। राज्य में कोई भी गैर सरकारी संगठन बाल गृह नहीं चला रहा। ऐसा नहीं है कि बाल गृह नहीं चल रहे, पर सरकारी रिकॉर्ड में एक भी बाल गृह नहीं है। कानून के मुताबिक, निजी बाल गृहों का पंजीकरण जरूरी है, पर पंजीकरण की फाइलों पर पहिये नहीं लगते, सो फाइलें नहीं चलती। केंद्र सरकार भी उत्तराखंड के इस हाल से बेहाल है। आईसीपीएस की फाइल को निकलवाने के लिए अब केंद्र सरकार के अफसर आए दिन देहरादून के चक्कर लगा रहे हैं। गवाह चुस्त है, मुद्दई सुस्त है। आईसीपीएस के अंतर्गत हर जिले में बाल गृह बन गए होते, तो अनाथ बच्चों को तुरंत आश्रय मिल जाता।
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