मोर आसपास के माहौल को गंदा करता है, तोते मनुष्य की नहीं, अपनी खुशी के लिए बोलते हैं और कोयल की जिस कूक की तारीफ में पन्ने पर पन्ने रंगे गए हैं, वह दरअसल अपनी प्रिया को रिझाने की कोशिश या खतरे के आसन्न संकेत की चेतावनी है।
चिड़ियों के बारे में यह निष्कर्ष महान प्रकृतिवादी स्वर्गीय एम कृष्णन का है, जिन्होंने बचपन से चिड़ियों को न सिर्फ बहुत नजदीक से देखा, बल्कि आजादी के बाद हमारी प्रकृति और पर्यावरण पर जिनकी टिप्पणियों का असंदिग्ध महत्व रहा है। वह अगर मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाने के फैसले पर आपत्ति दर्ज करते हैं और कौए को शहरों से भगाने के स्थानीय प्रशासनों की कोशिशों पर आपत्ति दर्ज करते हैं, तो विकास के मौजूदा मॉडल पर भी सवाल उठाते हैं।
भारतीय पक्षियों और उनके वैविध्य पर एम कृष्णन की यह किताब दरअसल उनके उन लेखों का संपादित संग्रह है, जो 'स्टेट्समैन' अखबार में लगातार पैंतालीस साल तक चले उनके लोकप्रिय कॉलम 'कंट्री साइड' में छपी रचनाओं का संकलन है।
सिर्फ यही नहीं हमारे आसपास दिखने वाले और दुर्लभ पक्षियों के बारे में भी उनकी व्यापक जानकारी चकित करने वाली है। उससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह कि एक ही चिड़िया पर कई लेख होने के बावजूद सूचनाओं और जानकारियों में कोई दोहराव नहीं है।
कृष्णन ने कठफोड़वा के बारे में बताया है कि बड़े वृक्षों के कटते जाने के कारण वे हमसे दूर चले गए हैं, क्योंकि वे बदलते समय से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं। दूसरी ओर गौरैया है, जिसमें किसी भी परिवर्तन के मुताबिक खुद को ढाल लेने का माद्दा है। जीवित रहने के लिए उसे थोड़ी हवा और बस थोड़ी-सी रोशनी चाहिए।
हमारे किस्सों में तोते-मैने की बहुतायत है और दोनों को वाचाल और नकल में पारंगत माना गया है। लेकिन मैना जहां खेतों के कीड़े खाकर किसान का काम आसान करती है, वहीं तोता खाने से ज्यादा बर्बाद करने के कारण कुख्यात है।
कृष्णन ने चिड़ियों से जुड़ी कई मान्यताओं का खंडन किया है। कौए को अनिष्टकारी चिड़िया मानने के बारे में ज्यादातर लोग एकमत हैं, लेकिन चालाकी, परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढाल लेने की क्षमता और किसी से न डरने के अपने स्वभाव के कारण कौआ लेखक के पसंदीदा पक्षियों में है।
कोई चीज फेंके जाने पर वे हवा में ही उसे चोंच में लपक लेते हैं, कभी पैरों का इस्तेमाल नहीं करते। चिड़ियों की मधुर आवाज की जब बात आती है, तो कोयल का नाम लिया जाता है, लेकिन पक्षीविज्ञानियों में इस पर मतभेद हैं।
डब्ल्यू एच हडसन किंगफिशर की आवाज को सबसे मधुर बताते हैं, सलीम अली ने यह खिताब ब्लैकबर्ड को दिया है, तो कृष्णन शमा की आवाज पर फिदा हैं। प्रकृतिविद् होने के कारण ही नहीं, पर्यावरण पर सरकारी नीतियों के मुंहफट आलोचक होने के कारण भी एम कृष्णन का व्यक्तित्व सलीम अली की तुलना में अधिक व्यापक और सुदूरप्रसारी था।
प्रकृति, जीव और पर्यावरण पर उन्होंने 'इंडियाज वाइल्डलाइफ' जैसा वैज्ञानिक दस्तावेज लिखा था, जो आजाद भारत में इस तरह की पहली ही नहीं, कदाचित आखिरी कृति भी है! जंगलों को काटकर पार्क बनाने की आधुनिक मानसिकता के इस आलोचक का कहना था कि जीव और पर्यावरण तभी बच पाएंगे, जब वनों को उनके स्वाभाविक स्वरूप में बनाए रखा जाएगा।
यह भी पूरी तरह सच नहीं है कि शहरी बसावट ने चिड़ियों की आबादी कम कर दी है। कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में पक्षियों की आबादी और उनके वैविध्य ने हमेशा ही लोगों का ध्यान खींचा है। एहा ने मुंबई, कनिंघम ने कोलकाता और डेवार ने चेन्नई के पक्षियों पर यादगार ढंग से लिखा है।