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चुनौतियों से भागते बच्चे

क्षमा शर्मा
Updated Mon, 10 Jun 2019 08:02 PM IST
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क्षमा शर्मा - फोटो : a

दिल्ली में छह साल की एक बच्ची ने मां से पैसे मांगे। मां ने पैसे तो दिए ही नहीं , बच्ची को डांट दिया। मां के डांटने से बच्ची को इतना गुस्सा आया कि वह घर से भाग गई। जब बच्ची देर तक नहीं दिखाई दी, तो मां ने उसकी खोज शुरू की। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से बच्ची को ढूंढा। इस बच्ची को नहीं मालूम था कि घर से भागने के कितने खतरे छिपे हैं। कोई उसका अपहरण कर सकता था। वह किसी हादसे का शिकार हो सकती थी। वह तो खैरियत थी कि वह मिल गई। आखिर उसके दिमाग में मां की डांट से भागने की बात क्यों आई होगी। मुंबई रेलवे स्टेशन पर काम करने वाली एक महिला सब-इंस्पेक्टर ने बताया था कि हर रोज उसे घर से भागे हुए सात-आठ बच्चे मिलते हैं, जिन्हें वह घरवालों से मिलाने की कोशिश करती है। किसी भी परेशानी को दूर करने का उपाय उन्हें घर से भागना लगता है।



कुछ दिन पहले इन पंक्तियों की लेखिका बाजार से लौट रही थी। एक युवा मिला तो उसने कहा कि मैं आपके बहुत से लेख पढ़ता हूं, लेकिन कई बार उनसे असहमत होता हूं। मेरा मानना है कि बच्चों को थोड़ा-सा डांट देना बुरी बात नहीं है। अगर बच्चा बीच सड़क पर खड़ा है, बिजली के खंभों को छू रहा है, किसी के साथ मारपीट कर रहा है, तो उसे डांटने में क्या हर्ज है।\


इस युवक की बात पर मुझे मनु जोसफ का हाल ही में लिखा लेख याद आया। उन्होंने लिखा, हमें नेता के रूप में साधनहीन पृष्ठभूमि से आए मेहनती नरेंद्र मोदी पसंद हैं। मगर अपने बच्चों को हम राहुल गांधी बनाना चाहते हैं, जिनके पास सारे संसाधन मौजूद हैं। उन्होंने यह भी लिखा था कि आज कितने माता-पिता ऐसे हैं, जो अपने बच्चों को जीवन में आने वाली चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार करते हैं। कितने उनसे घर का काम कराते हैं। जबकि एक समय ऐसा था कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते थे, उनसे घर का काम करने की उतनी ही उम्मीद की जाती थी। हम बच्चों को आत्मनिर्भर भी बनाना नहीं चाहते। बड़े बच्चों के साथ भी हम नौकरों को भेजते हैं। मध्यवर्गीय माता-पिता अपने बच्चों को वह सब कुछ देना चाहते हैं, जिसकी कमी उन्होंने बचपन में महसूस की। बच्चों को अपनी हैसियत से भी ज्यादा के स्वप्न दिखाए जाते हैं। इसीलिए बहुत से युवा मामूली चुनौतियां नहीं झेल पाते और किसी कोर्स में विफल होने पर कुछ और विकल्प चुनने के बजाय आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं। युवाओं द्वारा मामूली बातों पर जान देने की खबरें आती रहती हैं। क्या उनके लालन-पालन में कुछ कमी है? बच्चों को जो भावनात्मक सहारा चाहिए, उसकी जगह हम उन्हें अक्सर कोई उपहार पकड़ा देते हैं।


हमारे बचपन में अगर स्कूल में डांट पड़ती थी, तो बच्चे घर में आकर नहीं बताते थे। उन्हें पता था कि घर में शिकायत करने पर माता-पिता कहेंगे कि जरूर तुमने ही कुछ किया होगा। आज स्थिति बदल गई है। अध्यापक जानते हैं कि बच्चों से कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि माता-पिता लड़ने चले आते हैं। पुराने जमाने में तो पड़ोसी की डांट का भी बुरा नहीं माना जाता था। इन दिनों माता-पिता का अपना अहंकार तो बढ़ा हुआ है ही, बच्चों में भी वह अहंकार भर दिया जाता है।


इसी कारण बच्चे माता-पिता की डांट भी सहन नहीं कर सकते। इससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। जिन पश्चिमी देशों से यह विचार चला था कि बच्चों से कभी कुछ नहीं कहना चाहिए, वहीं अब कुछ वर्षों से यह बहस चल रही है कि बच्चों को डांटना-डपटना जरूरी है। तभी वे कुछ सीख सकते हैं।

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