तमिलनाडु की राजनीति पर भाजपा का पूरा ध्यान लगा हुआ है। जहां तक अन्नाद्रमुक का सवाल है, तो राष्ट्रपति पद के एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के बावजूद राज्य की राजनीति में वह पूरा लाभ नहीं उठा पाएगी। भाजपा अब तमिलनाडु पर ध्यान केंद्रित करेगी और वहां की राजनीति में दखल देगी, खासकर रजनीकांत के राजनीति में आने के फैसले के बाद। प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा और एक जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर लागू होने से उनकी प्रतिष्ठा में इजाफा तो हो ही सकता है, आयकर विभाग और सीबीआई के छापे के जरिये अन्नाद्रमुक को किनारे लगाने की मोदी की पूर्वनियोजित योजना भाजपा के लिए फायदेमंद होगी। राष्ट्रपति चुनाव के बाद तमिलनाडु की राजनीति नरेंद्र मोदी और भाजपा की मुखापेक्षी होगी, तभी एक स्पष्ट राजनीतिक तस्वीर उभरकर सामने आएगी।
नरेंद्र मोदी अकेले तमिलनाडु के राजनीतिक असंतुलन को खत्म कर सकते हैं। जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक के विभिन्न गुट नरेंद्र मोदी से मिलकर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से हस्तक्षेप के लिए कह चुके हैं। मूल रूप से अन्नाद्रमुक एक हिंदू आधारित राजनीतिक संगठन है, जो द्रविड़ राजनीति से लगातार दूर होता जा रहा है। लेकिन रजनीकांत द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाए जाने से द्रमुक क्यों परेशान है?
अगर अन्नाद्रमुक के उप महासचिव टीटीवी दिनाकरन पलानीस्वामी सरकार के लिए संकट लाना चाहते हैं, तो वह निश्चित रूप से तीस विधायकों को अपने पाले में कर सकते हैं, इससे स्वतः ई पलानीस्वामी की सरकार गिर जाएगी, लेकिन क्या दिनाकरन यह आत्मघाती कदम उठाएंगे? ई पलानीस्वामी खेमा टीटीवी दिनाकरन के साथ मिलने से बचना चाहता है। पिछले तीन महीनों में ई पलानीस्वामी ने दिनाकरन से बात नहीं की है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर ई पलानीस्वामी और टीटीवी दिनाकरन समझौते के लिए मिलें, तो अन्नाद्रमुक के तीनों खेमों के बीच विलय आसानी से हो सकता है। बहरहाल, तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए चार पहलुओं का विश्लेषण करना होगा।
पिछले छह महीनों में अन्नाद्रमुक के वरिष्ठ नेताओं और नरेंद्र मोदी के बीच काफी बैठकें हुई हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि अन्नाद्रमुक नेता राज्य में सरकार चलाने और पार्टी के भविष्य के बारे में उनसे मार्गदर्शन लेते हैं। नरेंद्र मोदी केंद्रीय अनुदान एवं वित्तीय सहयोग से तमिलनाडु सरकार को चलाने में मदद करते हैं। साथ ही, अन्नाद्रमुक के नेताओं पर आयकर विभाग और सीबीआई के छापे दर्शाते हैं कि अन्नाद्रमुक के नेता भ्रष्ट हैं। पार्टी की छवि बचाने के लिए पलानीस्वामी गुट और पन्नीरसेलवम गुट के नेताओं ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह से मुलाकात की। इन बैठकों से पलानीस्वामी खेमे में शांति और सांत्वना का भाव आया है। अभी तमिलनाडु सरकार पलानीस्वामी के नियंत्रण में है। भाजपा इस विवाद का लाभ उठाएगी और अन्नाद्रमुक के चार फीसदी वोट में से ज्यादातर अपने पक्ष में सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी। अन्नाद्रमुक संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है, ऐसे में केंद्र सरकार उसकी अनदेखी कैसे कर सकती है!
दूसरी सबसे बड़ी घटना है रजनीकांत का अचानक राजनीति में प्रवेश की घोषणा। रजनीकांत की राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा से द्रमुक को झटका लगा है, क्योंकि एक ओर जहां एम के स्टालिन पार्टी के निर्विवाद नेता बनकर उभर रहे थे, वहीं द्रमुक अन्नाद्रमुक सरकार को गिराने की योजना बना रहे थे। लेकिन रजनीकांत के राजनीति में आने से द्रमुक की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
करुणानिधि के 94वें जन्मदिन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चेन्नई पहुंचे थे। लेकिन द्रमुक की मदद करने के बजाय उन्होंने उसकी योजना को पटरी से उतार दिया। नीतीश ने वहां हिंदी में भाषण दिया, जिसे वहां के लोग ठीक से समझ नहीं पाए। द्रमुक ने विपक्षी पार्टी के नेताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए बुलाया था कि राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ विपक्षी दलों का एक साझा उम्मीदवार खड़ा हो। लेकिन बाद में राजनीति ने ऐसा मोड़ लिया कि लालू और नीतीश के बीच मतभेद पैदा हो गए। असल में स्टालिन उत्तर भारतीय राजनीतिक समीकरण को ठीक से समझ नहीं सके।
रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश और भाजपा के सहयोग से ई पलानीस्वामी सरकार को संजीवनी मिल गई है। द्रमुक ने अन्नाद्रमुक की चिंता छोड़ रजनीकांत को नुकसान पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया। इसी बीच द्रमुक ने अन्नाद्रमुक के दो गुटों के खिलाफ दो टीवी चैनलों के जरिये स्टिंग ऑपरेशन किया, लेकिन उससे द्रमुक को जनता की सहानुभूति नहीं मिली। बेशक द्रमुक कैडर आधारित पार्टी है, जिसकी राज्य के दूरस्थ इलाकों में सांगठनिक शक्ति है। लेकिन रजनीकांत के प्रशंसक (फैन क्लब) द्रमुक के वोट बैंक में सेध लगाते हैं। राज्य के लगभग सभी गांवों और शहरों में रजनीकांत के प्रशंसक हैं। हालांकि चुनाव में रजनीकांत की परीक्षा होनी है, लेकिन सभी विधानसभाओं में रजनीकांत के प्रशंसकों के पच्चीस से तीस हजार वोट हैं, इसलिए रजनीकांत द्रमुक का खेल बिगाड़ सकते हैं। इसके अलावा द्रमुक अन्नाद्रमुक के क्षेत्र में सेंध लगा पाने में विफल रही है। अन्नाद्रमुक के नेताओं की प्रशंसा करनी चाहिए कि जयललिता के निधन के बाद कोई एम के स्टालिन के पाले में नहीं गया। ऐसे में स्टालिन यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि अन्नाद्रमुक के विधायक उनके साथ आकर पलानीस्वामी की सरकार गिरा देंगे!
भाजपा नेता चाहते हैं कि अन्नाद्रमुक के तीनों गुट शांति से बैठें और अपनी समस्याओं को खुद सुलझाकर आपस में विलय कर लें। अन्नाद्रमुक के सियासी ड्रामे से भाजपा को ही फायदा हुआ है, क्योंकि कोविंद के पक्ष में उसने काफी वोट बटोरा है। भाजपा चाहती है कि तीनों गुट राजनीतिक, वित्तीय और जातिगत मुद्दों को सुलझा लें, क्योंकि भविष्य में जाति का मुद्दा उभर सकता है।