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दमनात्मक संघवाद: राज्यों के अधिकारों का सम्मान नहीं करती भाजपा

पी चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 04 Aug 2019 02:22 PM IST
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स्वयंसेवक - फोटो : अमर उजाला

मैंने 28 फरवरी, 1997 के अपने बजट भाषण में 'सहकारी संघवाद' मुहावरे का इ्स्तेमाल किया था। मैं यह दावा नहीं करता कि इस मुहावरे का इस्तेमाल करने वाला मैं पहला आदमी था, लेकिन मुझे इस बात की खुशी जरूर है कि बजट भाषणों और दूसरे अवसरों पर भी 'सहकारी संघवाद' शब्द का लगातार इस्तेमाल होता रहा है। राज्य संप्रभु हैं।



'सहकारी संघवाद' का मतलब क्या है? यह मुहावरा इसकी मान्यता देता है, और इस पर बल भी देता है कि भारत राज्यों का संघ है। यहां एक केंद्र सरकार और अनेक राज्य सरकारें हैं। हर सरकार के पास कानून बनाने की अपनी सीमा परिभाषित और आरक्षित है। केंद्र सरकार (संसद के जरिये) उन क्षेत्रों में अतिक्रमण नहीं कर सकती, जो राज्य सरकारों के लिए आरक्षित हैं। 


ऐसे ही राज्य सरकारें (विधानसभाओं के जरिये) उन क्षेत्रों में अतिक्रमण नहीं कर सकतीं, जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। कुछ ऐसे विषय हैं, जिन पर केंद्र और राज्य, दोनों कानून बना सकते हैं। 


विधायिका के क्षेत्रों का स्पष्टतर विभाजन ही संघवाद की खासियत है। जबकि सांविधानिक मानकों का सम्मान करना सहकारी संघवाद है। इसके बावजूद हमारे संविधान में कुछ अपवादी प्रावधान हैं, जो संसद को असूचीबद्ध मामलों (अनुच्छेद 248) या ऐसे मामलों में, जो राज्य सूची में होने के बावजूद 'जरूरी या राष्ट्रहित में उचित' हैं, सीमित अवधि के लिए कानून बनाने (अनुच्छेद 249); और आपातकाल की घोषणा के बाद किसी भी मामले में कानून बनाने (अनुच्छेद 250) का अधिकार देते हैं। 


अनुच्छेद 258 (2) एक दिलचस्प प्रावधान है। इसके तहत संसद में बना कानून राज्य सरकार तथा उसके अधिकारियों को कुछ शक्ति प्रदान करता है, तो साथ में कुछ कर्तव्यों का भी उसे पालन करना पड़ता है, लेकिन ऐसे में केंद्र को उतना धन राज्य को देना पड़ता है, जितने पर आपसी सहमति बनी हो। यह प्रावधान राज्यों की संप्रभुता, उनके अधिकारों तथा शक्तियों का ठोस उदाहरण है।


विधेयकों को पारित कराना


भाजपा सरकार एक अलग तरह की सरकार है : वह राज्यों के अधिकारों का सम्मान नहीं करती, न ही सांविधानिक सीमाओं या उसकी बारीकी का ध्यान रखती है। जिस तरह से राज्यसभा में विधेयक पारित कराए जा रहे हैं, वही संघवाद के प्रति भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में बहुत कुछ बता देता है। 


लोकसभा प्रतिनिधि सभा है, जबकि राज्यसभा राज्यों की परिषद है। राज्यसभा सदस्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों के हितों का संरक्षण करना और उन्हें आगे बढ़ाना है। विगत दो अगस्त को लोकसभा ने 28 विधेयक और राज्यसभा ने 26 विधेयक पारित किए। 
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इनमें से एक पर भी, मैं यह दोहराता हूं, इनमें से एक विधेयक पर भी विपक्ष से परामर्श लेने की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। न ही व्यापक परीक्षण के लिए किसी विधेयक को स्थायी समिति या प्रवर समिति (सिलेक्ट कमेटी) में भेजा गया। 


किसी विधेयक पर-इनमें वे विधेयक भी हैं, जो संविधान की समवर्ती सूची में शामिल हैं और जिनसे राज्यों के अधिकार प्रभावित होते हैं-राज्य सरकारों से परामर्श नहीं लिया गया। एक भी विधेयक पर विपक्ष द्वारा प्रस्तावित संशोधन को सरकार ने नहीं माना।


इस संदर्भ में कुछ उदाहरण काफी होंगे। न्यायमूर्ति पुट्टास्वामी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 110 के कार्यक्षेत्र की व्याख्या की थी, और वह फैसला सरकार के लिए बाध्यकारी है। राज्यसभा धन विधेयक (मनी बिल) में संशोधन नहीं कर सकती और न ही उसे खारिज कर सकती है; वह सिर्फ अपनी सिफारिशों के साथ इस विधेयक को वापस लोकसभा में भेज सकती है। 


लोकसभा के पास उन सिफारिशों को स्वीकार करने या न करने का अधिकार है। ऐसे ही राष्ट्रपति धन विधेयक को अपनी स्वीकृति देने के लिए रोककर नहीं रख सकते, न ही पुनर्विचार के लिए उसे संसद को वापस भेज सकते हैं। 


इन सीमाओं का लाभ उठाकर, लेकिन अनुच्छेद् 110 का अशालीनता के साथ उल्लंघन कर सरकार ने करीब दस गैर धन विधेयकों को धन विधेयक (नंबर 2) की तरह पारित कराया और उनमें संशोधन किए। इस तरह उसने राज्यसभा द्वारा की जाने वाली छानबीन या संशोधन प्रस्तावों से बचने का रास्ता निकाला।


सूचना के अधिकार कानून, 2005 की सार्वभौमिक तौर पर एक दूरगामी कानून बताया गया था। इस कानून का खंड 15 राज्य सरकार को राज्य सूचना आयोग के गठन का अधिकार देता है। 


इसके तहत राज्य सरकार को राज्य सूचना आयुक्तों का चयन और उनकी नियुक्ति करनी पड़ती है। आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल या पैंसठ साल की उम्र, जो भी पहले पूरा हो, का था। उनके वेतन, भत्ते और उनकी सेवाओं से संबंधित दूसरी शर्तें राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में थीं (खंड 16)। 


अब राज्य सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन, भत्ते और दूसरी सेवा शर्तों का अधिकार केंद्र ने अपने पास ले लिया है! हम लोगों ने सरकार से पूछा कि ऐसा क्यों किया? पर कोई जवाब नहीं मिला।


राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) विधेयक तो राज्यों को अपमानित करने और उनके अधिकारों के हरण का ज्वलंत उदाहरण है। चिकित्सा शिक्षा मुहैया कराने और इसे विनियमित करने की राज्य सरकार की हर शक्ति उनसे छीन ली गई है, और आयोग के चार साल के कार्यकाल में हर राज्य को सदस्य के तौर पर दो साल का कार्यकाल भर दिया गया है! 


यह ऐसा ही है, जैसे कि चिकित्सा के विषय को संविधान की तीसरी यानी समवर्ती सूची से हटाकर पहली यानी केंद्रीय सूची में डाल देना। इसके बावजूद राज्यों की परिषद से यह बगैर किसी विरोध के पारित हो गया!


उनके पास है हर दांव


सरकार ने राज्यसभा से विधेयकों को पारित कराने के लिए वोटों का प्रबंधन किस तरह किया?  मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून को ही लें, जिसे तीन तलाक विधेयक भी कहा जाता है। विपक्ष के 84 वोटों की तुलना में पक्ष में पड़े 99  वोटों के कारण सरकार को जीत मिली, क्योंकि वोटिंग के समय विपक्ष के 46 सदस्य गैरहाजिर थे! 


बसपा का एक भी सांसद मौजूद नहीं था, सपा के छह सांसद अनुपस्थित थे, एनसीपी के चार सांसदों में से दो ही मौजूद थे,  ठीक वोटिंग के दिन कांग्रेस के एक सांसद ने इस्तीफा दिया (और अगले दिन वह भाजपा में शामिल हो गए), जबकि चार कांग्रेसी सांसद अनुपस्थित थे। 


इस विधेयक के विरोध में बोलने वाले अन्नाद्रमुक, जेडी(यू), टीआरएस और पीडीपी जैसे दलों के सांसद ऐन वोटिंग के समय गायब हो गए! बांटने, फुसलाने, डराने, धमकी देने या बंद कमरे में 'सौदेबाजी करने'-भाजपा ने उन विधेयकों को पारित कराने के लिए हर तरीके का इस्तेमाल किया, जो राज्यों को नगर प्रशासनों में बदल देगा। 


यह इकलौतेपन के उसके उस अनर्थकारी विचार को मूर्त रूप देने की दिशा में एक और आयाम है, जिसका अभिप्राय है-हर चीज के लिए सिर्फ एक सरकार।  

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