पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अपनी हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, जब एक इनडोर स्टेडियम में वहां रह रहे पाकिस्तानियों के एक कार्यक्रम में उनके भाषण के दौरान बलूचिस्तान की आजादी के नारे लगे। मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के सदस्यों और समर्थकों ने यूएस कैपिटल हिल के सामने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया। जब इमरान पाकिस्तानी समुदाय के लोगों को संबोधित कर रहे थे, तभी बलूच कार्यकर्ताओं का एक समूह पाकिस्तान विरोधी नारे लगाने लगा। उन्होंने आजाद बलूचिस्तान के नारे लगाए और उसकी आजादी की मांग दोहराई। बाद में इमरान समर्थकों और बलूच कार्यकर्ताओं के बीच हाथापाई और झूमाझटकी भी हुई।
बहरहाल यह तो इस समस्या की एक ताजातरीन बानगी है, लेकिन इन दिनों कूटनीतिक और राजनीतिक हलकों में एक सवाल काफी तेजी से उभर रहा है। क्या बलूचिस्तान दूसरा बांग्लादेश साबित होगा? पाकिस्तान के इस सूबे के मौजूदा हालात तो यही सूरते हाल बयां कर रहे हैं। 1992 में अबू माली सैयद ने अपनी किताब द ट्विन एरा ऑफ पाकिस्तान : डेमोक्रेसी एेंड डिक्टेटरशिप में यह भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। लेकिन आज भी पर्यवेक्षकों का मानना है कि सैयद की यह भविष्यवाणी महज भू-राजनीतिक कल्पनाएं नहीं हैं।
बलूचिस्तान में बगावत से पाकिस्तानी सरकार की सख्ती से निपटने की रणनीति की वजह से यह प्रांतीय विद्रोह एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे में तब्दील हो गया है, जो हमेशा कांटे की तरह चुभता रहता है। और तो और इसने एक ऐसा फ्यूज निर्मित कर दिया है, जो पूरे पाकिस्तान को लपटों के हवाले कर सकता है। इस बात से इस्लामाबाद में बैठी हुई सरकार की नींदें हराम हो चुकी हैं।
बलूचिस्तान का इलाका पाकिस्तान की जमीनी सतह का 40 प्रतिशत है और उसकी मात्र सात प्रतिशत जनसंख्या वहां रहती है। फिलहाल इसे पाकिस्तान सरकार ने फौजी आतंकवाद विरोधी अभियान के नाम पर फौजी छावनी में तब्दील कर दिया है और बलूचियों के खिलाफ जबरदस्त दमनचक्र चलाया जा रहा है। और तो और यहां बेरोजगारी का स्तर सबसे ऊंचा है, 88 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे रहती है और पूरे देश की तुलना में शिक्षा की दर सबसे नीची यानी 70 प्रतिशत है।
बलूचिस्तान, पाकिस्तान के चार प्रांतों (तीन अन्य प्रांत हैं, पंजाब, सिंध और खैबरपख्तूनख्वा) में से एक है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में इस प्रांत को हिस्सा न दिया जाना विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा है। प्राकृतिक गैस और खनिज संसाधन यहां प्रचुर मात्रा में हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ ने सत्ता हथियाने के बाद बलूची समस्या से निपटने हेतु एक संसदीय आयोग का गठन किया था, जिसे इस समस्या का अध्ययन कर राजनीतिक और आर्थिक सुझाव देने थे। फिर उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का फायदा उठाकर इस इलाके में सेना तैनात कर दी।
एक गैस प्लांट में फौजियों द्वारा एक महिला डॉक्टर के बलात्कार से उपजा असंतोष जब हाथ से निकलता दिखाई दिया, तो पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस ने कई जगहों पर हमले किए जिन्हें आतंकवादी हमले बता कर फौज की मौजूदगी को जायज ठहरा कर उसे बनाए रखा गया। उक्त संसदीय आयोग ने इलाके में प्राकृतिक गैस के मुनाफे में 15-20 प्रतिशत बढ़ोतरी और इसके विकास के लिए 20-30 प्रतिशत संसाधन मुहैया करवाए जाने की सिफारिश की। इस्लामाबाद ने इन सिफारिशों पर कोई ध्यान नहीं दिया। पत्रकारों की बलूचिस्तान यात्राओं पर रोक लगा दी गई। सेना के चार ब्रिगेड, 35,000 सीमा रक्षक, 12,000 तटीय रक्षक , 8700 पुलिस अफसर, नौ विमान और 12 हेलीकाप्टर भेज दिए गए। उस दौरान वकील आसमा जहांगीर (अब दिवंगत) की अगुआई में गए मानवाधिकार आयोग के सदस्यों पर अज्ञात लोगों ने हमला किया था।
बलोच राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर बुगती ने संयुक्त राष्ट्र से इस क्षेत्रीय नरसंहार को रुकवाने की अपील की। कुछ दिनों बाद इस 82 वर्षीय नेता की लाश एक गुफा में पड़ी पाई गई। पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तरह पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ ने एक ऐसा शहीद पैदा कर दिया, जो जिंदा रहने की अपेक्षा मर कर और भी खतरनाक हो गया है। और इस समस्या के राजनीतिक हल के बजाय सैनिक हल ने सिविल वार की वही स्थिति पैदा कर दी है, जो 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के समय थी। बुगती की मौत के बाद सारे जनजातीय नेताओं के व्यक्तिगत झगड़े और वैचारिक मतभेद चमत्कारिक रूप से खत्म हो गए हैं और बलूचिस्तान की एकता यानी इत्तिहाद एक ठोस संभावना और लक्ष्य बन गया है।
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के पास फिलहाल एक ही बड़ा बंदरगाह है और वह है कराची। व्यावसायिक जहाजों, मछलीमार नौकाओं और सैनिक युद्धपोतों की कराची में भरमार रहती है, लिहाजा वहां बहुत भीड़भाड़ बनी रहती है। 1971 में भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह को निशाना बना कर काफी नुकसान पहुंचाया था, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी सीमा तक नेस्तनाबूद हो गई।
यदि बलूचिस्तान का ग्वादार बंदरगाह पाकिस्तान के हाथ से निकल जाता है, तो पाकिस्तान के सामने जमीन पर घिर जाने का अच्छा-खासा खतरा पैदा हो जाएगा और अगर कभी भारत से युद्ध हुआ तो रसद और हथियारों की आपूर्ति की मुश्किल हो जाएगी। ग्वादार बंदरगाह फारस की खाड़ी के मुहाने पर और तेलवाहक जहाजों के रास्ते पर है, जहां से हर दिन 130 लाख बैरल तेल गुजरता है। यह उसके चीन जैसे मित्र देशों को तेल की आपूर्ति का निकटतम रास्ता है और पाकिस्तान के हाथ में तुरुप के पत्ते की तरह है।
और हां, बलूचिस्तान के हालात ऐसे हैं कि वहां किसी मुक्ति वाहिनी की जरूरत नहीं है!