हिचकोले खाते-खाते आखिरकार 'वन रैंक वन पेंशन' की नाव किनारे लग गई। बात सीधी-सी थी। जूनियर को सीनियर से अधिक पेंशन नहीं मिलनी चाहिए। 'वन रैंक वन पेंशन' का स्वागत तो हुआ, मगर संजीदगी के साथ। पांच वर्ष के बजाय पेंशन का तीन वर्ष पर रिविजन कोई मुश्किल काम नहीं है। कमांड के पिरामिड स्वरूप के कारण योग्यताओं के बावजूद सैन्य अधिकारी प्रोन्नति से वंचित हो जाते हैं। वीआरएस लेना उनकी मजबूरी बन जाता है। अगर उन्हें न जोड़ा जाता, तो गलत होता। समस्या पेंशन नहीं है। 'वन रैंक वन पेंशन' पूर्व सैनिकों की सेवाओं का उपयोग न किए जाने का मुआवजा है। देश चाहे, तो प्रत्येक पूर्व सैनिक को 60 वर्ष की अवस्था तक राज्य और केंद्र की सेवाओं में समायोजित कर सकता है। लेकिन यह विचार न जाने किन लॉबियों के दबाव में स्वीकार नहीं किया जाता।
सड़क पर चले इस आंदोलन ने कई सवाल भी खड़े कर दिए। सेना के साथ राष्ट्रगौरव, त्याग और बलिदान की भावना भी जुड़ती है। सेना सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि जिंदगी का नजरिया भी है। सैन्य सेवा आपको एक सांचे में ढालती है। मुश्किलों से लड़ने का, हार न मानने का जज्बा पैदा होता है। यह सीधा सोचने, कमजोरों के साथ खड़े होने की ताकत देती है। चाहे हम सेना में रहें या सेना के बाद कॉरपोरेट, बिजनेस या प्रशासनिक दायित्वों में आ जाएं, सैन्य पृष्ठभूमि हमेशा हमें सशक्त करती चलती है।
हमने पेंशन मांगी, जिम्मेदारियां नहीं मांगी। पेंशन से पहले हम यह भी मांग सकते थे कि देश में हमारी क्षमताओं, योग्यताओं का उपयोग किया जाए। जो देश का सर्वाधिक सक्षम वर्ग है, वह सेवानिवृत्त होने भर से अयोग्य तो नहीं हो जाता। उसकी क्षमता का इस्तेमाल होना चाहिए। हम उन स्कूलों में पढ़ा सकते हैं, जहां मास्टर नहीं आते। हम अपने समाज में नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले बन सकते हैं। हम सेना के बाद अर्द्धसैनिक बलों में सरहदों की रक्षा कर सकते हैं। हम जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, नीति नियंता बन सकते हैं। लेकिन राष्ट्र निर्माण में हमने अपनी भूमिकाएं नहीं तलाशीं।
भौतिकता में जबर्दस्त वृद्धि के कारण माहौल बदल रहा है। हमें भी अधिक वेतन, अधिक पेंशन चाहिए। इस देश में जहां हमारे अधिकार हड़ताल, नारेबाजी, चक्का जाम और आग लगाने से मिलते हों, वहां अपनी जायज मांगों के, बिना मांगे मिल जाने की उम्मीद बेमानी हो चली है। सेवाओं में जातिगत आरक्षण के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के उदाहरण हमारे सामने हैं। जो देश का अमन-चैन भंग करने की धमकी देते हैं, उन्हें मजबूरन आरक्षण देने के लिए सरकारें बाध्य हो रही हैं। वे रेलवे की पटरियां उखाड़ देते हैं। आजादी के नायकों-चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह का नाम लेकर बसें जला दे रहे हैं। देश की सबसे समर्थ जातियों को भी आज आरक्षण की दरकार है। एक अंतहीन सिलसिला है, जो हमें खांचों में बांटकर विभाजित मानसिकता की भयावह दिशा में ले जा रहा है। लोकतंत्र और भीड़तंत्र में फर्क है। भीड़तंत्र ने तो राष्ट्रों तक को खंडित किया है। लोकतंत्र का एक यथास्थितिवादी चरित्र होता है, जो प्रायः सुविधा के आसरे खोज लेता है। इसीलिए लोकतंत्र से क्रांतियों की अपेक्षाएं नहीं की जाती। क्रांतियां तो यथास्थितिवादी शक्तियों का नाश करके ही आगे बढ़ती हैं। जातियां अलगाववादी सोच की प्रतीक हैं। जातिगत नेतृत्व को यथास्थिति में ही लाभ होता है और वे उसी के स्वभावगत पोषक होते हैं। अड़सठ वर्ष की आजादी में हमने देखा है कि राष्ट्र निर्माण में वर्ग और जातिगत हित ही सबसे बड़े बाधक हैं।
आज फिर जाति का विभाजनकारी दानव हमारे सिर चढ़कर बोल रहा है। पूर्व सैनिक जातिवादी विभाजन को ध्वस्त करता है। स्वार्थ कभी सेना का साध्य नहीं रहा। इसलिए जब सैनिक धरने पर बैठे, तो बड़ी तकलीफ हुई। एक सेना ही तो है, जहां राष्ट्रीयता की पौध उगती है। जब भी कभी निराशा घेरती है, तो इस देश का आम नागरिक सोचता है कि कुछ भी हो, सेना देश को बचा लेगी। सैनिकों को हमेशा से उनके योगदान, बलिदान से कम मिलता रहा है।
'वन रैंक, वन पेंशन' समस्या का एकमात्र समाधान पूर्व सैनिकों के इस सक्षम व प्रशिक्षित वर्ग को राज्य, केंद्र या निगमों की सेवाओं में 60 वर्ष तक सेवा का अवसर दिए जाने से ही होगा। यह जान-बूझकर नहीं किया जा रहा। पुलिस में, प्रशासन में पूर्व सैनिक नहीं के बराबर हैं, पर किसी को इसकी परवाह नहीं। वे सिक्योरिटी गार्ड बनने को मजबूर हैं। पूर्व सैनिक अक्सर प्रशासनिक अधिकारी भी बनते रहे हैं। सैन्य सेवा हमेशा प्रशासनिक सेवा में जोड़ी जाती थी। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय से यह प्रक्रिया रुक गई और रिवर्स भी हो गई। इसका अर्थ यह तो नहीं कि सैनिक सड़कों पर बैठ जाएं, आंदोलन करें, देश की वित्तीय मजबूरियां न समझें।
वर्ष 1932 में मिलिटरी एकेडमी के उद्घाटन के अवसर पर फील्ड मार्शल चेटवुड ने कहा था कि सबसे पहले राष्ट्र आता है, फिर हमारे सैनिक और अंत में हम आते हैं। यह प्रत्येक सैन्य अधिकारी की प्रतिज्ञा बनी, जो एकेडेमी के चेटवुड हॉल में दर्ज है। हमने क्यों नहीं चाहा कि हम अन्याय के विरुद्ध लड़ने में देश की ताकत बनेंगे? हम अपने परिवेश को बदलें, व्यवस्थाओं की बदहाली को सुधारें? आज हर वर्ग हिंदुस्तान का अपना हिस्सा मांग रहा है। हम अपना मिशन भूल गए, जमाने के साथ बह गए और उसी रौ में आ गए। पूर्व सैनिक तो मुल्क और झंडे के गारंटर हैं। सत्ता के दिन-रात के खेल में हम मोहरा न बनें। फतेहपुर सीकरी में अकबर के दरबार में संत कुंभनदास ने कहा था, संतन को कहा सीकरी सो काम...। जंतर-मंतर हमारी जगह नहीं है। यह उनकी है, जिन्हें सत्ता के खेल खेलने हैं। यह जगह उन्हें ही मुबारक हो।
-लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं