अभी मेरे पास टाइम नहीं है, यह जवाब सुनते ही आदमी शर्मिंदा हो जाता है। जैसे सूर्य से थोड़ी-सी धूप मांगी हो, और वह कहे कि धूप है नहीं। टाइम यानी समय को हमने मिनट-घंटा, दिन-रात, हफ्ता-महीना, साल-सदियों में बांट रखा है। ऐसे में यह सुनना बहुत बेतुका लगता है कि टाइम नहीं है।
इतने प्रगतिशील जमाने में हम रह रहे हैं, सब काम जल्दी-जल्दी में निपटा दिए जाते हैं, तेज से तेज रफ्तार वाले संसाधन हैं, हवा से बात करने वाले, ध्वनि और प्रकाश की गति जितने यान हैं। यहां तक कि मन की गति को भी मात दें, ऐसे साधनों का आविष्कार कर चुके विज्ञानी तथा 2जी, 3जी, 4जी वाले स्मार्ट मोबाइल जैसे उपकरण हमारे हाथ में हैं। इसके बावजूद अगर कोई कहे कि मेरे पास समय नहीं है, तो यह सुनकर शर्म आती है। सच यह है कि सामने वाले के पास मन ही नहीं है।
जमाने की भागमभाग में आज आदमी इस कदर पीटी ऊषा और मिल्खा सिंह बना हुआ है कि आलस्य त्यागकर, पैसे के पीछे, नौकरी धंधे के पीछे, छोकरी के पीछे, रोटी-बोटी के पीछे, फिल्मों के पीछे भाग रहा है। इन सबके लिए तो टाइम है, लेकिन अपने घर-परिवार के किसी काम के लिए टाइम नहीं है। एक कविता की चार लाइन है-वह कल तो भला-चंगा था,मर कैसे गया? जवाब था, उस आदमी के पास जीने का टाइम नहीं था। और वह दूसरा आदमी कैसे मरा? उत्तर था, उसे जीने को टाइम दिया ही नहीं गया। तो यह तीसरा आदमी जिंदा कैसे है? जवाब था, वह इतना बिजी है कि मरने की भी फुर्सत नहीं है उसके पास।
टाइम न होने की शिकायत करने वाले पुराने लोग अब पार्कों में बैठे-ठाले शामें ताश के पत्तों या शतरंज के मोहरों में खपाए गुजारते हैं। दूसरी ओर कपड़ों-गहनों के क्रेज में पड़ी और शॉपिंग-किटी पार्टियों में वक्त गुजारती महिलाओं के पास भी टाइम नहीं है! बीज से पेड़ तक पनपने-बढ़ने के मौके हैं। जीव-जंतु और मनुष्य के जन्म से मरण तक समय फैला हुआ है। उस पर भी हमें ऐसा सुनने को मिले कि टाइम नहीं है? लानत है ऐसे टाइमलेस यानी समयहीन प्राणी पर।