घरेलू क्रिकेट में 'रन मशीन' के नाम से चर्चित खिलाड़ी अगर अपने पहले अंतरराष्ट्रीय टेस्ट की पहली पारी में दहाई तक भी न पहुंच पाए, तो वह किस कदर दबाव में आ सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। वह भी तब, जब घरेलू मैचों में एक ही महीने में तीन तिहरे शतक मारने की उपलब्धि उसके नाम हो।
लेकिन 2010 की उस बॉर्डर-गावस्कर सीरीज के दूसरे मैच में यह कारनामा चेतेश्वर पुजारा ही कर सकते थे, जिन्होंने दूसरी पारी में 72 रन बनाकर मैच तो जिताया ही, पहले ही मैच की चौथी पारी में 50 या उससे अधिक रन बनाने वाले भारत के पांचवें बल्लेबाज भी बने। और अब उसी पुजारा ने हैदराबाद में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दोहरा शतक लगाकर मौजूदा सीरीज में भारत को अजेय बढ़त दिलाई है। वह टेस्ट उनका 11वां अंतरराष्ट्रीय मैच था, और इतने छोटे सफर में ही उनके हिस्से दो दोहरे शतक सहित चार शतक और एक अर्धशतक आ चुके हैं।
क्लासिकल क्रिकेट खेलने में यकीन रखने वाले पुजारा पिच पर खड़े होकर गेंद का इंतजार करना ज्यादा पसंद करते हैं। यह उनकी दृढ़ एकाग्रता और तकनीकी दक्षता की पहचान है। हालांकि उनके लिए द्रविड़ के स्थान (नंबर तीन) पर खेलना महज संयोग है। पहले टेस्ट मैच की स्मृति उनके जेहन में अब भी ताजा है, जिसकी दूसरी पारी में कप्तान धोनी ने उन्हें यह कहकर नंबर तीन पर भेजा था कि वह द्रविड़ की तरह विकेट पर टिककर खेलें। और उन्होंने कप्तान का भरोसा नहीं तोड़ा।
कुछ ऐसी ही बातें पिछले वर्ष न्यूजीलैंड के खिलाफ मुकाबले में हुई, जिसमें उन्होंने पहला शतक लगाया था। बस फिर क्या था, नई गेंद घिसने के बाद बल्लेबाजी की चुनौती से जूझने के लिए पुजारा को नंबर तीन पर उतारा जाने लगा और वह मध्यक्रम की नई 'दीवार' बन गए।
अंतर्मुखी स्वभाव के पुजारा के लिए उपलब्धि की यह पिच पिता अरविंद पुजारा के रणजी खिलाड़ी होने के बावजूद आसान नहीं रही है। भले ही पिता ने बचपन में ही परख लिया था कि उनका 'चिंटू' पांव का सही इस्तेमाल कर लेता है, लेकिन सफलता के लिए सिर्फ प्रतिभा ही काफी नहीं होती, योग्यता को मांजना भी पड़ता है।
और इसलिए अरविंद छुट्टियों में सौराष्ट्र से मुंबई आकर बेटे को प्रशिक्षण दिलवाते। इसी क्रम में मां का देहांत होना भी पुजारा को कचोटता रहा। पर पुजारा अब सभी परेशानियों को 'पुल' कर चुके हैं और 'नीली जर्सी' में खेलने का सपना देख रहे हैं।