इस महीने पाकिस्तानी सेना ने दावा किया कि उसने परमाणु सक्षम क्रूज मिसाइल बाबर-तीन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। इंटर-सर्विसेज प्रेस रिलेशन की विज्ञप्ति के मुताबिक यह मिसाइल पाकिस्तान को विश्वसनीय पलटवार की क्षमता प्रदान करेगी। इस परीक्षण को परमाणु रणनीति और पाकिस्तान के पड़ोस में अपनाए जा रहे रवैये के प्रति सोची-समझी प्रतिक्रिया बताया गया है। यानी इसका मतलब है कि अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करेगा, तो पाकिस्तान के पास पलटवार की क्षमता होगी। पलटवार की क्षमता अस्तित्व रक्षा पर जोर देती है और समुद्र में लांच मिसाइल से बेहतर तरीके से हासिल की गई है। विज्ञप्ति के मुताबिक, जिस तरह भारत अरिहंत परमाणु चालित पनडुब्बी पर आधारित बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता वाली एक पनडुब्बी विकसित कर रहा है, उसके जवाब में पाकिस्तान ने एक पनडुब्बी आधारित क्रूज मिसाइल क्षमता विकसित की है। क्रूज मिसाइल बैलिस्टिक मिसाइल की तुलना में धीमी होती है, जो एक अप्रत्याशित पथ पर काफी नीचे के इलाकों में उड़ान भरती है और इसलिए उससे बैलिस्टिक मिसाइल का मुकाबला करना काफी कठिन है।
कुछ भारतीय विशेषज्ञों ने इस परीक्षण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसके जो फोटो और वीडियो जारी किए गए हैं, वे विश्वसनीय नहीं हैं और न ही हवाई और समद्री ट्रैफिक को इसके बारे में सूचना दी गई। फिर भी ऐसे मामलों में यह मानना समझदारीपूर्ण होगा कि वास्तव में पाकिस्तान ने यह क्षमता स्वदेशी विकास से नहीं, बल्कि चीन से हासिल की है। इस मिसाइल को लेकर दो तरह के विचार हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह अमेरिकी टॉमहाक मिसाइल (जो अपने लक्ष्य अफगानिस्तान पहुंचने के बजाय बलूचिस्तान में गिर गई थी) का चीन द्वारा डिजाइन किया गया विपरीत संस्करण है। लेकिन कुछ अन्य का मानना है कि यह कोरशुन मिसाइल का परिष्कृत संस्करण है, जिसकी टेक्नोलॉजी कुछ वर्ष पहले चीन द्वारा यूक्रेन से खरीदी गई थी।
इसी बीच एक हफ्ते बाद पाकिस्तानी मिसाइल कार्यक्रम को तब झटका लगा, जब अमेरिका ने पाकिस्तानी मिसाइल को विकसित करने में भूमिका के चलते सात पाकिस्तानी संस्थाओं पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिया। इस समय अमेरिका द्वारा ऐसी 49 संस्थाओं पर निगरानी रखी जा रही है। इस कार्रवाई की शुरुआत शाहीन-तीन के लांच के कारण ही हुई, जिसकी रेंज 2,750 किलोमीटर है। अमेरिकी खबरों के मुताबिक, भले ही पाकिस्तान के अधिकारी बताते हैं कि यह मिसाइल पाकिस्तान को अंडमान और निकोबार तक पहुंच की क्षमता प्रदान करती है, पर अमेरिका की चिंता यह है कि इसकी पहुंच इस्राइल और यूरोप के कुछ हिस्सों तक हो सकती है।
पाकिस्तान का मिसाइल कार्यक्रम और उसकी परमाणु क्षमता भारत केंद्रित है। हालांकि रणनीतिकार कहते हैं कि क्षमता महत्वपूर्ण है, इरादा नहीं। अमेरिका दरअसल इस बात से चिंतित है कि निकट भविष्य में पाकिस्तान की क्षमता दूसरी दिशा में भी घूम सकती है।
इस बीच अमेरिका के नए रक्षा मंत्री पद के लिए मनोनीत जेम्स मैटिस ने संकेत किया है कि भारत और पाकिस्तान को लेकर बुनियादी अमेरिकी नीति जारी रहेगी। यानी अमेरिका इस बात पर ध्यान केंद्रित करेगा कि पाकिस्तान पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले समूहों के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही, अमेरिका भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाएगा, जिसे हाल ही में एक बड़ा रक्षा सहयोगी बताया गया है, जबकि पाकिस्तान के साथ वह एक प्रभावी भागीदारी विकसित करेगा।
पाकिस्तान चाहे जो करे, भारत का ध्यान चीन पर केंद्रित है और सच यह है कि बीजिंग केवल अमेरिका को लेकर चिंतित है। इसलिए वह अमेरिका को रोकने के लिए मिसाइल एवं सिस्टम विकसित कर रहा है। पर चीन की बढ़ती क्षमताओं से भारत में चिंता है, क्योंकि वह इसका भारत के खिलाफ पहले इस्तेमाल कर भारत की शक्ति संतुलन क्षमताओं को बेअसर कर सकता है। चीन को भारत जवाब दे सकता है, पर पाकिस्तान ने जो क्षमताएं हासिल की हैं, भारत उनकी अनदेखी नहीं कर सकता। बेशक भारत और चीन, दोनों ने यह प्रतिबद्धता जाहिर की है कि वे एक-दूसरे के खिलाफ अपनी परमाणु क्षमता का पहले इस्तेमाल नहीं करेंगे। लेकिन दोनों की चिंता है कि बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा या मल्टीपल इंडिपेंडेटली टारगेटेड ह्विकल हथियार उनकी स्थिति नाजुक बनाएंगे। परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने से इन्कार करने के बावजूद पाकिस्तान अन्य देशों-भारत, अमेरिका या इस्राइल की परमाणु हथियार क्षमता से डरा हुआ है।
परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किसी भी देश के लिए विनाशकारी होगा। अगर कोई देश किसी दूसरे देश के खिलाफ इसका इस्तेमाल करेगा, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दूसरा देश जवाबी हमला नहीं करेगा। और मात्र एक या दो परमाणु हथियार ही भारी विनाश और लाखों लोगों की जान लेने के लिए पर्याप्त होगा।
इसलिए परमाणु संपन्न देशों के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि वे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के लिए आपस में संवाद करें। दुर्भाग्य से विभिन्न देशों के अहं के कारण ऐसी वार्ता बंधक पड़ी है। चीन भारत को परमाणु संपन्न देश मानने से इन्कार करता है, क्योंकि भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के मना कर दिया है। भारत और पाकिस्तान ने परमाणु सिद्धांतों और 1999 के लाहौर समझौते के तहत विभिन्न मुद्दों पर बात करने के लिए सहमति जताई थी, पर जनरल मुशर्रफ द्वारा तख्तापलट किए जाने के बाद ऐसा नहीं हो सका।
परमाणु हथियारों की प्रकृति को देखते हुए उन्हें अन्य हथियारों से अलग श्रेणी में रखा जाना चाहिए और हमें अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों के साथ संवाद बनाए रखने की जरूरत है, चाहे अन्य मुद्दों पर हमारे रिश्ते उनके साथ तल्ख ही क्यों न हों।
-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं।