सड़कें किसी भी देश अथवा क्षेत्र के विकास का संवहन तंत्र होती हैं। यही कारण है कि कल्याणकारी सरकारों का देश में सड़क निर्माण एवं उनके सुदृढ़ीकरण पर जोर रहा है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील उत्तराखंड क्षेत्र के पर्वतीय जिलों में पड़ने वाले कुल 889 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण का निर्णय लिया गया। इस परियोजना का नाम पहले 'ऑल वेदर रोड' घोषित किया गया, जिसे बाद में बदलकर 'चार धाम परियोजना' रखा गया।
वर्ष 2017 में सड़क चौड़ीकरण का कार्य आरंभ किया गया। जैसे-जैसे कार्य आगे बढ़ा, परियोजना से होने वाले पर्यावरणीय क्षरण को लेकर विवाद गहराने लगा। इस परियोजना से लगभग 35,000 पेड़ काटे जाने का अनुमान था, जबकि विशेषज्ञों का मानना था कि इससे कहीं अधिक पेड़ों का कटान होगा। यही नहीं, बड़े भूस्खलन क्षेत्र विकसित होने की आशंका, जैव विविधता का बड़े पैमाने पर नुकसान और पहाड़ों पर विद्यमान जलस्रोतों के क्षरण सहित विभिन्न सामाजिक पहलुओं को लेकर परियोजना पर विवाद बढ़ता गया।
कुछ सामाजिक संगठनों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय में भेजा गया। शीर्ष न्यायालय ने मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए पर्यावारणविद रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार कमेटी गठित की। रवि चोपड़ा इससे पहले 2013 में घटित केदारनाथ आपदा के दौरान उत्तराखंड में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं के आकलन के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं।
इस कमेटी की अनुशंसा के आधार पर ही उत्तराखंड की आधा दर्जन निर्माणाधीन परियोजनाओं का कार्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोका गया है। चारधाम परियोजना में सड़क की चौड़ाई 12 मीटर किए जाने का प्रावधान है। इससे सड़क के ऊपर ढाल पर कुल 24 मीटर क्षैतिज चौड़ाई की भूमि अधिग्रहण होगी, जिसे 'राइट ऑफ वे' कहते हैं। संवेदनशील हिमालय के पहाड़ों पर सड़क की चौड़ाई जितनी ज्यादा की जाएगी, पहाड़ के ऊपरी तरफ ढाल पर भूस्खलन की आशंका उतनी ही अधिक हो जाएगी। चूंकि सड़क का कार्य पिछले तीन साल से जारी है, अतः बरसात में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं।
सड़क की चौड़ाई भले ही 2012 की गाइड लाइन के आधार पर निर्धारित की गई हो, पर इंडियन रोड कांग्रेस ने इस प्रावधान के अनुसार निर्मित हिमालय की सड़कों के कारण संभावित विनाश को देखते हुए 2018 में इसे पूर्णतः संशोधित कर नया दिशा-निर्देश जारी किया, जिसमें पक्की सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर होगी तथा दोनों ओर डेढ़-डेढ़ मीटर का कच्चा फुटपाथ रहेगा। विवाद इस बात पर भी है कि जब 2018 में भारतीय रोड कांग्रेस की नई गाइड लाइन जारी हो गई थी, तब भी चारधाम परियोजना में सड़कों के चौड़ीकरण का काम 2012 के प्रावधान के अनुसार क्यों रखा गया।
वैसे तो संपूर्ण हिमालय के ढाल ही संवेदनशील हैं, तथापि उच्च हिमालय के ढलान अन्य भागों की अपेक्षा अधिक भंगुर हैं। इसलिए यदि मध्य हिमालय के क्षेत्र में सड़क 12 मीटर चौड़ी कर भी दी गई थी, तो उच्च हिमालय क्षेत्र में इसे कम करना औचित्यपूर्ण होता। तर्क यह दिया जा रहा है कि सीमा पर चीनी सैनिकों की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर चौड़ी सड़कें जरूरी हैं। हालांकि करीब एक साल पहले पत्रकारों से बात करते हुए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल विपिन रावत ने कहा था कि सीमा तक आवश्यक उपकरण और रसद पहुचने के लिए हमें सिर्फ सड़क चाहिए, बहुत चौड़ी सड़क की जरूरत नहीं है। वैसे भी युद्ध की स्थिति में चौड़ी सड़क कई बार नुकसानदेह भी हो सकती है।
सवाल मलबे के निस्तारण को लेकर भी उठ रहे हैं। परियोजना की डीपीआर में मलबा निस्तारण स्थलों का प्रावधान है, पर मलबे के ढेर के नीचे की तरफ से समुचित रोकथाम हेतु दीवारों के न होने से बरसात में मलबा बहकर नदियों में चला जाता है और व्यापक विनाश का कारण बनता है। पहाड़ों पर एक किलोमीटर सड़क निर्माण में 30 से लेकर 60 हजार घन मीटर मलबा निकलता है। इसका समुचित निस्तारण भी एक चुनौती है। ऐसे में, देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई पावर कमेटी अदालत में क्या रिपोर्ट जमा करती है।