ये आंकड़े संकेत देते हैं कि देश में महिलाओं की शैक्षिक और डिजिटल, दोनों पहुंच में उल्लेखनीय प्रगति हो रही है। दरअसल, पिछले एक दशक में देश तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा है। सस्ते स्मार्टफोन, कम कीमत वाले डाटा पैक, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन शिक्षा, ई-गवर्नेंस सेवाओं और सोशल मीडिया के विस्तार ने इंटरनेट को आम लोगों की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। इसका सर्वाधिक सकारात्मक पहलू यह है कि तकनीक और सूचना तक पहुंच में पुरुषों व महिलाओं के बीच लंबे समय तक जो खाई बनी हुई थी, वह अब धीरे-धीरे कम होती दिख रही है।
हालांकि, रिपोर्ट का एक दूसरा पहलू भी है, जो इन उपलब्धियों के बावजूद व्यापक असमानताओं को भी सामने लाता है। शहरों में छह वर्ष या उससे अधिक उम्र की बालिकाओं की स्कूल में उपस्थिति दर 84.3 फीसदी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 69.2 फीसदी ही है। इसी तरह, डिजिटल पहुंच के संदर्भ में शहरों में जहां 77.3 फीसदी महिलाओं ने इंटरनेट का उपयोग करने की बात कही, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा घटकर 58.6 फीसदी रह गया। इससे जुड़ा एक पक्ष यह भी है कि इंटरनेट का कम से कम एक बार उपयोग करना और उसका प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।
देश में अब भी बड़ी संख्या में महिलाएं इंटरनेट का सीमित उपयोग सिर्फ मनोरंजन तक ही कर पाती हैं और उन्हें डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा तथा ऑनलाइन अवसरों के बारे में अधिक जानकारियां नहीं हैं। हालांकि, इसमें संदेह नहीं कि सर्वे के निष्कर्ष सरकार द्वारा चलाए जा रहे डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों की कामयाबी की ही पुष्टि करते हैं, लेकिन अब जरूरत इन प्रयासों को अधिक व्यापक और लक्ष्य-उन्मुख बनाने की है। केवल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि महिलाओं को उसका सुरक्षित, रचनात्मक और उत्पादक उपयोग करने में सक्षम बनाना भी उतना ही जरूरी है। खासकर, ग्रामीण क्षेत्रों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और वंचित समुदायों की महिलाओं तक डिजिटल सुविधाओं तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। जब महिलाएं सूचना, शिक्षा और आर्थिक अवसरों से और गहनता से जुड़ेंगी, तो इसका फायदा केवल उन्हें नहीं, बल्कि पूरे परिवार व समाज को भी मिलेगा।