कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नए दमखम से राजनीति के मैदान पर उतरे हैं। जब से उन्होंने दागियों को बचाने वाले अपनी ही सरकार के अध्यादेश का विरोध किया है, तभी से उनके तेवर तल्ख दिख रहे हैं। उनके विरोध के तरीके और इस्तेमाल की गई भाषा का भारी विरोध भाजपा ने किया था, लेकिन राहुल गांधी जानते हैं कि उनके विरोध ने भाजपा के हाथ से बड़ा मुद्दा छीन लिया और साथ ही मनमोहन सिंह सरकार की और ज्यादा किरकिरी होने से बचा लिया। जहां तक विरोध के तरीके का सवाल है, तो राहुल गांधी ने अपनी गलती मान ली और बड़ी चालाकी से उसे चुनावी मुद्दा भी बना दिया है।
अध्यादेश के विरोध के बाद राहुल गांधी कई सभाओं में जनता से रूबरू हो चुके हैं। हर जगह उन्होंने यही कहा कि बेशक विरोध का तरीका ठीक नहीं था, लेकिन सच कहने का कोई तयशुदा समय नहीं होता। अब सवाल उठता है कि क्या राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में राहुल की कांग्रेस किसी दागदार नेता को टिकट नहीं देगी या सिर्फ उन दागदारों को टिकट देने से बचा जाएगा, जिन पर लगे आरोप उन्हें दो साल से अधिक की सजा दिलवा सकते हैं। क्या कांग्रेस दागदार नेताओं के बेटों, रिश्तेदारों और भाई-भतीजों को भी एवज में टिकट देने से परहेज करेगी। अगर कांग्रेस ऐसा कर पाई, तभी हम कह सकेंगे कि दागियों को बचाने वाले अध्यादेश का विरोध कर राहुल गांधी ने नाटक नहीं किया।
अच्छी बात यह है कि वह कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक को ही पुख्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान में चूंकि कांग्रेस की सरकार है, लिहाजा उन्होंने बढ़-चढ़कर बताया कि किस तरह अशोक गहलोत की सरकार भोजन के अधिकार पर अमल कर रही है। यही राहुल गांधी दिल्ली के दलित सम्मेलन में दलित उत्थान के प्रति चिंतित नजर आए। यहां नजर दिल्ली के चुनाव पर थी। बसपा ने पिछली बार दिल्ली में करीब 14 फीसदी वोट और दो सीटें हासिल की थीं। वह जानते हैं कि इस बार बसपा कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकती है। लेकिन राहुल दलितों के उत्थान का जो फॉर्मूला सुझा रहे थे, वह शायद ही किसी को समझ में आया होगा। उनका कहना था कि दलित जातिवाद की जकड़न में इस कदर धंसे हुए हैं कि इससे निकलने के लिए उन्हें बहुत जोर लगाने की जरूरत है। पर राहुल गांधी से यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि दलित कांग्रेस के हाथ से आखिर कैसे निकल गए।
अलीगढ़ और रामपुर में राहुल गांधी के निशाने पर मुज्जफरनगर के दंगे थे। उन्होंने मजहब की राजनीति करने वालों को कोसते हुए भाजपा, सपा और बसपा को निशाने पर लिया। वह जानते हैं कि ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हुई, तो उनके सहयोगी दल अजित सिंह की पार्टी का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सफाया हो जाएगा, जिसका सर्वाधिक लाभ भाजपा को होगा। ऐसे में कांग्रेस मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी, लिहाजा सपा को निशाने पर लिया गया। लेकिन बसपा की आलोचना कर राहुल गांधी ने अगर यह संकेत देने की कोशिश की है कि कांग्रेस और बसपा के बीच चुनावी तालमेल की छप रही खबरें निराधार हैं, तो यह भाजपा के लिए खुशखबरी है।
चुनावी फायदा उठाने की कोशिश में राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण विधेयक का जिक्र करते हुए विपक्ष पर इस विधेयक को पारित कराने में अड़ंगे लगाने की बात की। सच यह है कि भाजपा के जरूरी संशोधनों को सरकार ने स्वीकार किया, उसके बाद ही यह विधेयक कानून की शक्ल ले सका। चूंकि यह विधेयक कांग्रेस सरकार ने पारित किया है, इसलिए उसे इसका सियासी लाभ लेने का अधिकार है, पर इसका मतलब यह नहीं कि विपक्ष पर निशाना साधा जाए। 'भरपेट रोटी खाएंगे, कांग्रेस को लाएंगे' का नारा लगाते हुए राहुल ने बड़ी चतुराई से उत्तर प्रदेश सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अखिलेश सरकार इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं कर रही, वह आपको भूखा रखना चाहती है। यह अच्छी रणनीति है, पर एक सवाल-राहुल की राजनीतिक समझ बदल रही है या उन्होंने अपने सलाहकार और स्क्रिप्ट राइटर बदल लिए हैं।