किसको चंदन कहा, विष किसने पिया, सांप किसको कह रहे थे, यह राज सिर्फ नीतीश कुमार ही जानते हैं। लेकिन उनकी इस बात से इतना तो हम सब जान गए कि लालू यादव के साथ उनकी नई दोस्ती में चंदन से ज्यादा विष मिलेगा। अक्सर किसी मजबूरी के कारण ही दुश्मनों में अचानक दोस्ती होती है। बिहार में ऐसा ही कुछ हुआ है, इन दो राजनेताओं में। मोदी के डर ने इन दोनों को दोस्ती करने को मजबूर कर दिया। मगर भला कौन भूल सकता है मुख्यमंत्री पद संभालते वक्त नीतीश कुमार की वह बात, कि लालू के जमाने में राज्य में कानून-व्यवस्था की जगह 'जंगल राज' था? लोकसभा चुनाव के दौरान लालू की सभाओं को भी भला कौन भूल सकता है, जिसमें उनके परिवार के इतने सदस्य दिखते थे कि यह स्पष्ट हो गया था कि इन दिनों लालू वंशवाद में ज्यादा, और बिहार के विकास में कम रुचि लेते हैं? कौन भूल सकता है कि नीतीश कुमार वंशवाद का विरोध कई बार कर चुके हैं?
इन बातों को याद दिलाकर मैं यह नहीं कह रही कि अगले विधानसभा चुनाव में बिहार के मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में मत देना चाहिए। लेकिन यह जरूर कहना चाहूंगी कि बिहार जब तक कोई ठोस राजनीतिक विकल्प नहीं ढूंढ पाता है, तब तक वह देश के विकास में एक बड़ी बाधा बना रहेगा। हालिया आंकड़ों से पता चला है कि देश की 73 फीसदी आबादी इतनी गरीब है, कि एक पूरे परिवार का दैनिक खर्च 200 रुपये से भी कम है। दुखद है कि मैंने बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे परिवार सबसे ज्यादा देखे हैं। ऐसा नहीं है कि ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवार नहीं हैं, पर वहां गरीब-से-गरीब गांवों में भी मैं जब गई हूं, तो सुंदरता और सभ्यता, हस्तकला, नृत्य, संगीत आदि के अद्भुत रूप दिखाई पड़े।
पिछले लोकसभा चुनाव में मैं इस उम्मीद में बिहार गई थी कि नीतीश कुमार के दस वर्षों के शासन में परिवर्तन आया होगा। लेकिन पटना की गलियों का हाल देखकर ऐसा लगा, जैसे किसी नर्क में पहुंच गई हूं। हर जगह सड़ते कूड़े के ढेर थे, तो हर गलियों में गंदी नालियां दिख रही थीं। इतना ही नहीं, हर मोड़ पर कोई-न-कोई ऐसा दृश्य जरूर दिख रहा था, जो साबित करता था कि आर्थिक तौर पर बिहार अब भी उतना ही बेहाल है, जितना लालू-राबड़ी के राज में था। हां, यह जरूर है कि देहातों में मुझे ऐसे काफी लोग मिले, जिन्होंने नीतीश कुमार की प्रशंसा यह कहकर की कि उन्होंने कानून-व्यवस्था को सुधारने का काम किया है। पर गरीबी का यह हाल है कि मैं जब मुसहरों के गांव में गई, तो ऐसा लगा, मानो मैं 1987 वाले बिहार में पहुंच गई हूं।
बिहार की गरीबी के चलते-फिरते सुबूत हर महानगर में मिलते हैं। मुंबई-दिल्ली के रईसों की कोठियों में घरेलू कामगार तकरीबन बिहार या ओडिशा से आते हैं। महानगरों में मेहनत-मजदूरी करके गुजारा करने वाले लोगों में बिहार से आए लोगों की संख्या अधिक है। इतना ही नहीं, पंजाब के खेतों में फसल काटने बिहार से ही खेत-मजदूर आते हैं। कहने का मतलब यह है कि राजनीतिक विकल्प की जरूरत जितनी बिहार के लोगों को है, शायद ही किसी दूसरे राज्य के लोगों को है। लिहाजा अगर जातिवाद, या धर्म-मजहब के झगड़ों के कारण लालू-नीतीश राज की वापसी होती है, तो यकीन मानिए, बिहार का भविष्य रोशन नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कानून-व्यवस्था में आया सुधार भी शायद बेकार हो जाएगा। इसलिए सोच-समझकर ही बिहार के लोगों को कोई फैसला लेना होगा।