महबूबा मुफ्ती की सरकार जब पिछले सप्ताह गिरी, तब कांग्रेस के कई समर्थकों ने ट्वीट करके कहा कि यह तो होना ही था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महीनों से कहते आ रहे हैं कि पिछले दो वर्ष में कश्मीर घाटी में हिंसा केवल इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि भाजपा का जम्मू-कश्मीर सरकार में शामिल होना कश्मीर घाटी के लोगों को बर्दाश्त नहीं था। या तो सोच-समझ कर झूठ बोल रहे हैं ये लोग या इनको इतिहास की समझ नहीं है।
वर्ना उन्हें याद कैसे न होता कि कश्मीर की वर्तमान राजनीतिक समस्या शुरू हुई थी 1984 में, जब इंदिरा गांधी ने फारूक अब्दुल्ला से नाराज होकर उनकी सरकार गिराई थी? कांग्रेस के समर्थक कैसे भूल गए हैं कि ऐसा करके इंदिरा गांधी ने कश्मीरियों को याद दिलाया था कि उनको कभी लोकतंत्र नहीं मिलने वाला है?
आगे बढ़ने से पहले कुछ राजनीतिक यादें ताजा करना चाहूंगी। शेख अब्दुल्ला के मरने के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा का पहला चुनाव 1983 में हुआ था। उस समय मैं कोलकाता के अखबार टेलीग्राफ में काम कर रही थी और मुझे चुनाव कवर करने श्रीनगर भेजा गया। कश्मीर घाटी में मैं तीन हफ्ते रही और आम लोगों की भावनाएं समझने के लिए उरी के अलावा हर चुनाव क्षेत्र में घूमी थी। मैं जहां भी गई, वहां लोगों ने मुझे बताया कि अब उनमें अलगाववाद की इच्छा नहीं है और वे भारतीय नागरिक बनकर अपना वोट डालने वाले हैं। यानी ऐतिहासिक कश्मीर समस्या समाप्त हो गई थी।
इंदिरा गांधी ने फारूक की सरकार गिराकर इसको दोबारा जीवित किया और राजीव गांधी ने इसे जीवित रखा, जब 1986 में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ने के लिए फारूक पर दबाव डाला। विपक्ष की जगह जब खाली हुई, तो मुट्ठी भर अलगाववादी गुटों का मुस्लिम फ्रंट बना, जिसे हराना जरूरी समझा गया, सो चुनाव में धांधली हुई, जैसे कश्मीर घाटी में हर चुनाव में होती आई है।
सो कश्मीर समस्या का सारा दोष नरेंद्र मोदी पर डालने वाले कांग्रेस के लोग झूठ बोल रहे हैं। लेकिन यह कहना भी जरूरी है कि नरेंद्र मोदी ने अगर नए सिरे से अपनी कश्मीर नीति बनाई होती और वास्तव में परिवर्तन और विकास जमीनी तौर पर लाकर दिखाया होता, तो हो सकता है, बुरहान वानी की हत्या के बाद भी घाटी में शांति बहाल रहती। परिवर्तन दिखाने का पहला अवसर था बाढ़ राहत लोगों तक पहुंचाने का। मोदी ने इसका इरादा भी व्यक्त किया था, जब वह 2014 में श्रीनगर गए थे।
एक राहत पैकेज की घोषणा हुई, पर वह पैकेज महीनों तक वित्त मंत्रालय में अटका रहा। जब तक राहत पहुंची लोगों तक, तब तक वह बेमतलब हो गई थी। इसके बाद भी न परिवर्तन दिखा है, न विकास। माना कि कश्मीर में जेहादी संस्थाओं ने विकास होने नहीं दिया, लेकिन जम्मू और लद्दाख में विकास क्यों नहीं हुआ? इस राज्य के इन दोनों प्रांतों में अगर पर्यटन की सुविधाओं में निवेश किया होता केंद्र सरकार ने, तो घाटी के पथरबाज भी काबू में आ गए होते।
राज्यपाल शासन लगने के बाद ऐसा करने के लिए एक अवसर मिल गया है मोदी सरकार को। प्रशासनिक तरीकों में अब अगर परिवर्तन दिखने लगता है आम लोगों को, तो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक समस्या का समाधान निकट भविष्य में दिख सकता है। कश्मीर के जेहादियों को हराने का बड़ा हथियार आर्थिक है, राजनीतिक नहीं। अगर जम्मू और लद्दाख में युद्ध स्तर पर विकास लाया जाता है, तो कश्मीर घाटी के बहके हुए नौजवान शायद देखने लगेंगे कि जेहाद किए बिना भी उनका भविष्य रौशन हो सकता है।