मैंने बृहस्पतिवार को अपने दोस्त और साथी पत्रकार शुजात बुखारी को अंतिम विदाई दी। वह स्थानीय अखबार राइजिंग कश्मीर के संपादक थे, जिसने इस युद्ध से लथपथ क्षेत्र में, जिसे हम घर कहते हैं, अमन कायम करने की अपनी कोशिशों को कभी मुल्तवी नहीं किया। परिजनों और दोस्तों की मौजूदगी में सेब के बागानों और हरे-भरे पहाड़ों से घिरे उनके उत्तरी कश्मीर के पैतृक गांव क्रीरी में उन्हें दफनाया गया।
श्रीनगर को बृहस्पतिवार को काम खत्म करने के बाद मैंने उनसे मुलाकात की थी और उनसे मिलने वाले आखिरी लोगों में मैं भी शामिल था। उस दिन व्यस्त सड़क से जब मैं लौट रहा था, तो उन्होंने मुस्कराते हुए मुझे विदा किया था। आधे घंटे से भी कम समय के बाद मोटरसाइकिलों पर सवार होकर आए हमलावरों ने उन्हें और उनके दो अंगरक्षकों को गोलियां मार दीं। हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए वह गुरु और दोस्त जैसे थे और उन्होंने हमें कभी मायूस नहीं किया।
दशकों से हमारी पत्रकार बिरादरी आतंकवादियों और भारतीय सुरक्षा बलों की धमकियों के बीच काम करती है। लेकिन बुखारी ने कभी अमन की उम्मीद नहीं छोड़ी और वह हमें अपना काम करते रहने के लिए प्रेरित करते रहे। दुनिया के भीषण संघर्षों में से एक को यदि हम दशकों से कवर कर सके हैं, तो सिर्फ इसीलिए।
उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हरेक संघर्ष विराम को पूरी उम्मीद के साथ कवर किया, बावजूद इसके कि उन्हें अनिवार्य रूप से नाकाम होना था। उन्होंने दसियों हजार नागरिकों के बारे में लिखा, जोकि कश्मीर की हिंसा में मारे गए, उन्होंने उन कब्रगाहों के बारे में लिखा, जिनसे हमारे ग्रामीण इलाके अटे पड़े हैं, उन प्रदर्शनों के बारे में भी और उम्मीद की हल्की-सी किरण के बारे में भी।
बुखारी की पत्रकारिता ने किसी को नहीं बख्शा, उन्होंने बहुत ही सावधानी के साथ कश्मीर के दर्द को दर्ज किया। उन्होंने सबके बारे में लिखा, जिनमें अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले हिंसक आतंकवादी, कश्मीर से भारतीय और पाकिस्तानी सेना की एक दूसरे के खिलाफ की जाने वाली गोलाबारी शामिल हैं।
बुखारी को धमकियां मिलती रही हैं। बृहस्पतिवार को वह जिन अंगरक्षकों के साथ जा रहे थे, उन्हें यह सुरक्षा डेढ़ दशक पहले उन्हें मिली धमकी के बाद दी गई थी। कश्मीर में पत्रकार के रूप में काम करना छुरे की धार पर चलने जैसा है। ऐसा है मानो आपको हर रोज नया जीवन मिलता है और आप सबको हैरत में डालते हुए एक बार फिर से जोखिम भरी रिपोर्टिंग के लिए निकल जाते हैं।
कश्मीर के हालात दशकों पहले के मुकाबले बेहतर हुए हैं, जब भारत और पाकिस्तान के बीच इस क्षेत्र को लेकर तीन युद्ध हुए और 1990 के दशक की शुरुआत में जब हिंसक आतंकवादियों ने ताकत अर्जित की। इसके बावजूद मैं दरवाजा खोलने से पहले अपनी कार का मुआयना करने से नहीं चूकता। मैं सूनसान या अंधेरे से घिरे रास्तों में कार ड्राइव करने से डरता हूं। अपनी हर स्टोरी के छप जाने के बाद मैं इस भय से सांस थाम लेता हूं कि कोई अज्ञात हमलावर इसे लेकर मेरी पत्रकारिता को मुद्दा न बना ले और मेरी ओर गोली न दाग दे।
बुखारी मेरे करियर पर नजर रखे हुए थे, और जब 2014 में मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ काम करना शुरू किया, तब वह बहुत खुश हुए। 2016 में जब द टाइम्स में मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था, उस समय वह न्यूयॉर्क में ही थे और वहां से अखबार की एक प्रति लेते आए और श्रीनगर आकर मुझे भेंट की। 2008 में बुखारी ने इस उम्मीद के साथ राइजिंग कश्मीर की शुरुआते की कि यह कश्मीरियों की स्वतंत्र आवाज बनेगा। उन्होंने देश के सर्वाधिक सम्मानित अखबारों में शुमार द हिंदू के श्रीनगर के ब्यूरो चीफ के रूप में डेढ़ दशक तक काम किया। श्रीनगर से उन्होंने 1990 के दशक में शुरू हुई अलगाववादी गतिविधियों को कवर किया था।
जल्द ही वह शांति वार्ताओं का हिस्सा बन गए और दशकों पुराने इस संकट के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में जुट गए थे। बुखारी यह मानते थे कि संकट का समाधान निकालना है, तो हरेक को ऐसे प्रयासों में शामिल करना होगा। वह भारतीय और पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों और यहां तक कि हिंदू राष्ट्रवादियों से भी बात कर रहे थे, जोकि भारतीय अल्पसंख्यकों को, जिनमें कश्मीर के मुस्लिम भी शामिल हैं, उनके बुनियादी नागरिक अधिकारों से वंचित करना चाहते हैं।
बुखारी ने एक बार कहा था कि ये लोग मेरे पीछे पड़े हुए हैं, लेकिन भारतीय समाज से बात करके ही रास्ता निकल सकता है। उनकी पहचान बन चुके आयताकार चश्मे, मुस्कराहट, भारी-भरकम आवाज और ऊंचे कद वाले बुखारी अपने सहयोगियों से बहुत सहजता से पेश आते थे।
बुरहान वानी की मौत के बाद 2016 में जब नए सिरे से हिंसा का उभार हुआ, उसके बाद मैंने आतंकवादियों, पुलिस अधिकारियों और नागरिकों के अंतिम संस्कार की दर्जनों घटनाओं को कवर किया। ऐसी कहानियां मेरा पीछा करतीं, ठीक इसी तरह मेरे होमलैंड की फीकी पड़ती उम्मीदें मुझे झकझोर देती थीं और अंततः मैं अवसाद और व्यग्रता से ग्रस्त हो गया, जिसका मुझे इलाज तक करवाना पड़ा। कश्मीर घाटी में एक रिपोर्टर की जिंदगी ऐसी ही है। कोई नहीं जानता कि आपकी पत्रकारिता से कौन-सा पक्ष नाराज हो जाए या फिर आपका लिखा कौन-सा एक वाक्य आपके सिर पर लगने वाली गोली का सबब बन जाए, जैसाकि बुखारी के साथ हुआ।
बुखारी से पहले 2003 में इस क्षेत्र में जिस पत्रकार की हत्या हुई थी, वह थे परवेज मोहम्मद सुलतान, जिन्हें आतंकवादी गुट के आंतरिक झगड़े से संबंधित रिपोर्ट लिखने पर निशाना बनाया गया था। कश्मीर में पत्रकारों को दशकों से धमकियां, उत्पीड़न और हिरासत का सामना करना पड़ता रहा है। बुखारी कहते थे कि यह हमारे पेशे का हिस्सा है।
© The New York Times