भारत के प्रस्तावित स्मार्ट शहरों के सामने बड़ी चुनौती किसी एक परिभाषा की छतरी तले आने की है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने इसके लिए कई सेवाओं की कसौटी तय की है। मसलन, परिवहन के मामले में मध्यम आकार के शहरों में यात्रा में लगने वाला न्यूनतम समय 30 मिनट, जबकि मेट्रो शहरों में 45 मिनट होना चाहिए। इसी तरह, हर व्यक्ति को रोज 135 लीटर पानी मिलना चाहिए। इसके अलावा 95 फीसदी आवास ऐसे होने चाहिए, जहां से फुटकर सामान की दुकानें, पार्क, प्राथमिक स्कूल और मनोरंजन स्थल महज 400 मीटर की दूरी के भीतर हों। प्रस्तावित स्मार्ट शहरों में वाराणसी से लेकर धोलेरा व अमरावती जैसे ब्राउनफील्ड (पुराने शहरों के नवीनीकरण से तैयार शहर) और ग्रीनफील्ड (पूरी तरह से नए बनाए गए शहर) दोनों श्रेणियों के शहर शामिल हैं। ध्यान देने वाली बात है कि भारत के कमजोर आर्थिक हालात और इंटरनेट तक पर्याप्त पहुंच न होने की वजह से ब्राउनफील्ड स्मार्ट शहर गगनचुंबी इमारतों के निर्माण, बड़ी सोसाइटियों और विहार के लिए शानदार उद्यानों के निर्माण पर फोकस नहीं कर सकते।
बढ़ती आधुनिकता की ओर
स्वतंत्रता मिलने के बाद से ही भारत में बेहतर शहरों की इच्छा पैदा होने लगी थी। 1950 के दशक में क्षेत्रीय नियोजन और शहरी मास्टर प्लान को वैचारिक महत्ता तो मिली, मगर एक निर्धन और नव स्वतंत्र उत्तर औपनिवेशिक देश की जटिल वास्तविकताओं से इनकी दूरी बनी रही। शहरी गरीबी में इजाफा होने के साथ-साथ इन मास्टर प्लानों ने निचली बस्तियों को उखाड़ते हुए, मंथर गति से फैलते कम घने शहरों की तरफ अपनी रुचि दिखाई। आधुनिकता की ओर बढ़ता यह झुकाव अपनी पराकाष्ठा पर तब पहुंचा, जब नए शहरों को बनाने की बात होने लगी। गौरतलब है कि शहरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग ने 329 शहरों की पहचान की और उन्हें 'आर्थिक वृद्धि के इंजन' की संज्ञा दी। इन शहरों को आगे वर्गीकृत करते हुए राष्ट्रीय प्राथमिकता वाले और राज्य स्तरीय प्राथमिकता वाले केंद्रों में बांटा गया। इसी गलियारे में शहरीकरण के बढ़ने की उम्मीद की गई। समय के साथ ये राष्ट्रीय प्लान समानता और पुनर्वितरण के लुभावने वायदों के साथ अपनी चमक खोते गए, और इसी के साथ एक बेहतर, स्वच्छ और समावेशी शहरों की इच्छाएं अधूरी रह गईं। सच तो यह है कि हम शहर कम बनाते हैं, उनके नाम ज्यादा बदलते हैं।
स्मार्ट शहरों के निर्धारक
बींसवीं सदी के ज्यादातर समय के दौरान स्मार्ट शहर का विचार विज्ञान की फंतासी तक ही सीमित था। मगर आज के शहर सड़क, रेल, एयरपोर्ट इत्यादि आधारभूत संरचना के घटकों को एक साथ बेहतर बना सकते हैं। इतना ही नहीं, आज शहर संसाधनों का बेहतर उपयोग और रख-रखाव के बेहतर नियोजन की व्यवस्था कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो तंगहाल आर्थिक हालात की वजह से यहां शहरों को नगर परिवहन, ई-गवर्नेंस और भूमि अधिकार की बेहतर व्यवस्था पर फोकस करके शहरी प्रबंधन के मामले में बेहतर नतीजों पर फोकस करना चाहिए।
बसों का कुशल नेटवर्क
एक टिकाऊ शहर के लिए सार्वजनिक परिवहन आवाजाही का प्रमुख साधन होना चाहिए। मेट्रो सेवाएं बड़े शहरों में ही व्यावहारिक हैं। ऐसे में, एकीकृत बस सेवाओं की भूमिका बढ़ जाती है। राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति (2006) में सार्वजनिक परिवहन का हिस्सा 22 से 60 फीसदी तक बढ़ाने की बात की गई थी, मगर अफसोस की बात है कि भारत के 90 प्रमुख शहरों में से केवल 30 में बेहतर बस व्यवस्था है। दरअसल, एक यूनीफाइड मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी की व्यवस्था होनी चाहिए, जो परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं के निर्माण व क्रियान्वयन को बेहतर बनाने की दिशा में काम करे। इसके अलावा कई स्तरों पर, मसलन, ऑटोमेटेड व्हीकल लोकेशन सिस्टम, ऑनलाइन फेयर कलेक्शन सिस्टम इत्यादि, सुधार किए जाने की जरूरत है। इन कार्यक्रमों को अंजाम देने के लिए एक शहरी परिवहन फंड बनाया जाना चाहिए, जैसा कि अहमदाबाद, बेंगलूरू और जयपुर में है।
ई-गवर्नेंस की बेहतर व्यवस्था
भारत सरकार ने इस दिशा में कई पहलें की हैं। मगर साइबर सुरक्षा की कमजोर व्यवस्था और डाटा की सुरक्षा से जुड़े खतरों की वजह से ये पहलें कामयाब नहीं हो पाईं। इसके लिए वॉयरलेस हॉट स्पॉट, वाइ-फाई नेटवर्क और फाइबर ऑप्टिक के जरिये घर-घर में इंटरनेट पहुंचाने की व्यवस्था के साथ सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का एक मजबूत तंत्र बनाए जाने की जरूरत है।
भूमि अधिकार
सभी के लिए बेहतर आवास की व्यवस्था करना अब भी चुनौती बना हुआ है। केंद्र, राज्य और नगर निगम स्तर के विधानों ने हालात को और मुश्किल बनाया है। गौरतलब है कि भारतीय शहरों में विकास से जुड़ी परियोजनाओं को मंजूरी के लिए तमाम स्तरों से गुजरना पड़ता है। हालांकि भारतीय कानून जमीन के विक्रय के अनिवार्य पंजीकरण की बात करता है, मगर यह पंजीकरण करने वाले प्राधिकारी को जमीन के इतिहास या उसके स्वामित्व की जांच के लिए बाध्य नहीं करता। इससे जमीन को खरीदने वाले के लिए जोखिम बढ़ जाता है। एक स्मार्ट शहर में पारदर्शिता में बढ़ोतरी, ब्रोकरों के पंजीकरण, लगने वाले समय और लागत में कटौती के साथ भूमि पर अधिकारों की पूरी व्यवस्था को एक मजबूत औपचारिक स्वरूप दिया जा सकेगा।
निष्कर्ष
जो आसानी से संभव उपाय हैं, उन्हें लागू करके और जो भी तकनीक उपलब्ध है, उसका उपयोग करके स्मार्ट शहरों की दिशा में आगे बढ़ा जाना चाहिए। परिवहन व्यवस्था में सुधार, वहनीय आवास की व्यवस्था और सरकार के रोजमर्रा के कार्यों को तकनीकी के हवाले करके उद्देश्यों को आसानी से हासिल किया जा सकता है। स्थानीय शहरी जरूरतों को पूरा करने के लिए जमीनी स्तर पर सुधारों की चाक-चौबंद व्यवस्था करनी होगी।