आज की तारीख में ग्लोबलाइज्ड दुनिया के किस देश से बिजनेस करना कितना आसान या कठिन है, इस पर एक ताजा रपट आई है, जो 196 देशों का इस आधार पर गुणवत्ता क्रम दिखाती है। रपट में भारत तालिका की 132वीं पायदान पर है। यदि सत्ता से सीधी अंतरंगता न हो, तो भारत में उद्योग लगाना या चलाना दुष्कर है। व्यवस्था इतनी सुस्त है कि बिजली कनेक्शन पाने में औसतन 67 दिन लगते हैं, निर्माण काम का परमिट 196 दिन लेता है।
वहीं कुछ लोगों को चौबीस घंटे के भीतर सारे कागजात मिल जाते हैं, सारी हरी झंडियां भी! कैसे? इसके लिए तनिक पीछे साठ के दशक तक जाना होगा। तब एक तरफ बपौतीवाद था, तो दूसरी तरफ उसको अक्षम बनाता आक्रामक सिंडिकेट। टकराव बढ़ा, तो जनता ने तय किया कि सिर्फ बड़बोले प्रवचन देनेवाले सिंडिकेटी अशासन से एक कारगर कुशासन शायद बेहतर हो। लिहाजा सिंडिकेट को अलविदा कहकर जनता ने नया निजाम चुन लिया, जिसके साथ ही शिखर पर एक हिमशिखर सरीखे शुभ्र नेता और उसके नीचे चुपचाप कीचड़ में से चंदा तथा वोट बैंक पैदा करते जानेवाले पार्टी क्षत्रपों और ठेकेदारों के हुजूम का द्वैतवाद भारतीय राजनीति में आया, जो तब से कायम है।
जब तक केंद्र स्तर पर अधिक उखाड़-पछाड़ नहीं थी और दलों के भीतर की खींचतान भी राष्ट्रवादी और दलीय अनुशासन के भीतर ही रही, चंदे और वोट बैंक उगाही के खतरे सीमित रहे। लेकिन अब गठजोड़ की राजनीति ने तमाम पुराने दलीय समीकरण और शक्ति आवंटन के आधार बदल डाले हैं और क्षत्रपों और उनके ठेकेदारों बिचौलियों का हुजूम ही सीधे चुनाव में जीत-हार तय कराने लगा है। अब किसी भी शिखर नेता के लिए निरंतर हिम धवल बने रहना संभव नहीं। उसे बार-बार जमीन पर उतर कर काले चीकट हाथ वालों से बार-बार हाथ मिलाने ही पड़ेंगे और अपने समर्थक क्षत्रपों की क्षेत्रीय अफरातफरी के प्रति तोताचश्मी भी अख्तियार करनी ही होगी।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस समय दलों में यह ज्ञान उपज रहा है, उसी समय उदारवादी अर्थनीति के तहत जमीन, स्पेक्ट्रम, वन और खदान सरीखे सीमित राष्ट्रीय संसाधनों का फटाफट वितरण बहुत जरूरी बन गया है। इतने बड़े पैमाने पर अनेक तरह के वितरण को यथासंभव समतापरक, पारदर्शी और वैध रखने के लिए नियामक संस्थाओं, परंपराओं और कानूनों की बहुत जरूरत है। लेकिन चीजें इतनी तेजी से बदली हैं कि हमारे कई कानून, परिभाषाएं और नियामक संस्थाएं बेहद पुरानी और अक्षम साबित हो रही हैं।
जरूरी है कि हम मान लें कि मौजूदा तंत्र तथा नियम-कायदे बिचौलियों को बढ़ावा देनेवाले साबित हो रहे हैं, लिहाजा व्यवस्था को जल्द से जल्द उनको सुधारना ही होगा। यह दुखद है कि इस समय भी व्यवस्था की कुरसी के नीचे डायनामाइट लगाने और जमीन के घोटालों के चटपटे ब्योरों में तो हर कोई रस ले रहा है, पर जमीन अधिग्रहण या स्पेक्ट्रम बंटवारे जैसे कानूनों में जरूरी संशोधनों की जमीनी समीक्षा बहुत कम की जा रही है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित नए भूमि अधिग्रहण कानून को ही लें, तो इसका ताजा प्रारूप निजी या सार्वजनिक या भागीदारी योजनाओं के लिए जरूरी बड़े पैमाने पर किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण के मूल्य के आकलन का काम कहीं उन्हीं राज्य सरकारों को तो दोबारा नहीं थमा देगा, जिनके तहत घोटाले हुए। जमीन विकास कार्यों के लिए खरीदकर सरकार के कुछ न्यस्त स्वार्थी तत्व अपने चुनिंदा जनों को न थमा दें, इसकी कितनी गारंटी यह कानून देगा?
इस बिंदु पर हरियाणा में जमीन की रजिस्ट्री तथा तत्संबधी कानूनों के विभागीय प्रमुख रहे वरिष्ठ अफसर अशोक खेमका का बयान बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने दिखाया है कि हमारे कानून अंतर्विरोधी साबित हो रहे हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम की दोबारा नीलामी और सरकारी जमीन के आवंटन व बिक्री पर सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार यह संसाधन जनता की संपत्ति हैं और उनका वितरण इसी नजरिये से किया जाना चाहिए कि जनता को नुकसान न हो।
लेकिन अब भी मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून इस तरह का है कि वह हर राज्य सरकार को सड़क बांध सरीखे सार्वजनिक कामों के नाम पर किसानों से बहुत कम दाम पर खरीदी जमीन का वितरण या उसके इस्तेमाल की पुनर्व्याख्या स्वविवेक के आधार पर तय करने का हक दे रहा है। यह दूध की रखवाली बिल्ली को देने वाली बात है। लिहाजा आज निजी पार्टी द्वारा सरकार से जमीन खरीदते ही बाजार में उसकी कीमत रातोंरात दूनी-चौगुनी हो जाती है।
गडकरी तथा दमनिया प्रकरणों में यह भी दिख रहा है कि विकास के नाम पर ली जमीन पर काम हो जाने पर बची शेष जमीन सरकार जब उसके उपयोग की परिभाषा बदल कर किसी को कौड़ियों के मोल बेच दे और वह बंदा उसे आगे रिहायशी या कमर्शियल उपक्रमों के लिए सोने के मोल बेचकर रातोंरात करोड़ों कमा ले, तो अदालत में उसको दोषी साबित करना आसान नहीं होगा।
हम अजीब समय में रह रहे हैं, जहां बाजारों के वैश्वीकरण और सूचना संचार तकनीकी में रोजाना हो रहे बदलावों की गति इतनी तेज होती जा रही है कि हमारे देश में कई बार हमें मानवाधिकार, सूचनाधिकार और राष्ट्रीय संसाधनों के बंटवारे के मुद्दे पर पुराने कानूनी प्रावधानों और नैतिकता के तकाजों में तीखी टकराहट दिखाई दे रही है और विकास के लिए बनी नेकनीयत नीतियां और सरकारी संस्थाएं गरीबी मिटाने और लालची उपभोगवाद घटाने के लिहाज से नाकाफी साबित हो रही हैं। आवास मंत्रालय की एक ताजा रपट के अनुसार देश में फिलवक्त एक करोड़ दस लाख मकान खाली पड़े हुए हैं, जो अमीरों द्वारा सिर्फ पूंजी निवेश की दृष्टि से खरीद लिए गए। उधर देश के एक करोड़ नब्बे लाख गरीब बेघर बने हुए हैं।
यहां हम श्री खेमका के ही एक तर्कसंगत सुझाव की तरफ ध्यान दिलाना चाहते हैं। उनकी राय में जमीन की धांधलियों पर आधार कार्ड के उपयोग से लगाम लगाना संभव है, यदि सरकार हर रजिस्ट्री ऑफिस में बेचने तथा खरीदने वालों की पहचान उनके आधार कार्ड के आधार पर करने की बाध्यता तय कर दे। जिस अपारदर्शिता का सहारा लेकर राज्यों के अफसर और नेता जमीन मामलों में धांधली करते रहे हैं, यह सुझाव उसकी जड़ में मट्ठा डाल सकता है।