रोज अनेक भारतीय अखबार तो पढ़ता ही हूं, साथ में फाइनेंशियल टाइम्स भी पढ़ता हूं, क्योंकि यह पूर्ण रूप से एक अंतरराष्ट्रीय अखबार है, और विदेशी आंख कई बार वे चीजें देख लेती है, जो देसी आंख नहीं देख पाती। फाइनेंशियल टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट ने इसे साबित भी किया। पिछले दिनों उसमें छपी एक खबर का शीर्षक था-'भारत में चपरासी और गार्ड के विज्ञापन ने 23 लाख युवाओं को आकर्षित किया।' यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के युवाओं में सरकारी नौकरी की कितनी चाह है। इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश सरकार ने चतुर्थ श्रेणी यानी चपरासी के 368 पदों के विज्ञापन दिए थे। 23.2 लाख युवाओं ने इन पदों के लिए आवेदन किया था। उनमें से 255 पीएच.डी थे, अनेक आवेदकों के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी, तो 25,000 से अधिक परास्नातक थे।
इतनी बड़ी संख्या में सुशिक्षित युवाओं ने प्रथम श्रेणी के अधिकारियों की मेज पर चाय देने या उनके ऑफिस के बाहर खड़े होने की नौकरी के लिए आवेदन क्यों किया? फाइनेंशियल टाइम्स ने इसकी एक वजह यह बताई कि उत्तर प्रदेश में देश के दूसरे राज्यों की तुलना में उद्योगों की स्थिति ठीक नहीं, इसलिए वहां रोजगार के अवसर बहुत ही कम हैं। लेकिन इसके अलावा भी आवेदकों की इस भीड़ की दो और वजहें हो सकती हैं।
एक वजह तो यही कि सरकारी नौकरियां निजी क्षेत्र की नौकरियों की तुलना में अधिक सुरक्षित होती हैं-वहां आप किसी को काम न करने पर नहीं निकाल सकते-इसके अलावा सरकारी नौकरी में पेंशन की सुविधा है। इसके अलावा परास्नातक की जो डिग्री इन युवाओं ने हासिल की,वे उतने योग्य भी नहीं, क्योंकि वे उन कॉलेजों से निकले हैं, जहां प्राध्यापक पढ़ाते नहीं, और जहां का पाठ्यक्रम दशकों पुराना है। हालांकि सरकारी नौकरियों के प्रति मोह देश के दूसरे राज्यों में भी है। लेकिन संभवतः उतना नहीं, जितना उत्तर प्रदेश में है। दक्षिण और पश्चिम भारत में बेहद विकसित निजी क्षेत्र है। वहां के कॉलेज और विश्वविद्यालय भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के न हों, लेकिन उनकी दशा उतनी खराब भी नहीं है। महाराष्ट्र या तमिलनाडु में यह कल्पना करना मुश्किल है कि इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में परास्नातक युवा सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी से संतुष्ट हो जाएगा। इसके बजाय वह किसी सॉफ्टवेयर फर्म में विश्लेषक की नौकरी के लिए प्रयास करेगा।
लेकिन उत्तर प्रदेश में चपरासी के ये 400 पद, जो सरकारी नौकरी में भी सबसे निचला पद माना जाता है, देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में ज्यादा मूल्यवान हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार भारतीय पैमाने पर भी बहुत गरीब है। राज्य में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति दयनीय है। जबकि अपराध निरंतर बढ़ रहे हैं। बंगलूरू में मेरे एक दोस्त ने, जो मूल रूप से कानपुर का है, हाल ही में मुझे बताया कि यह एक मिथक है कि उत्तर प्रदेश में कारोबार और कारोबारी नहीं फलते-फूलते। वे फलते-फूलते हैं, पर दक्षिण भारत की तुलना में दूसरे तरीके से। मसलन, कानपुर में ही हाल के दौर में तीन चीजों, बोतलबंद पानी, सुरक्षा गार्ड मुहैया करने की एजेंसी और जनरेटर सेट लगाने का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ा है। ये तीनों ही सेवाएं मुहैया कराने का दायित्व सैद्धांतिक तौर से राज्य सरकार का है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर वह इसमें विफल है।
इस तरह से देखें, तो उत्तर प्रदेश सरकार की विफलता ने राज्य के अनेक उद्यमियों के लिए संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं। यानी जहां बंगलूरू जैसे शहर में स्टार्ट-अप्स से जुड़े उद्यमियों को एन आर नारायण मूर्ति और नंदन नीलेकणि जैसी शख्सियतें प्रेरित करती हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में महत्वाकांक्षी युवा कारोबारी पोंटी चड्ढा जैसों के नक्शे-कदम पर चलना चाहते हैं। वे उन्हीं की तरह राजनेताओं से नजदीकी बनाकर सरकारी फंड का अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं, और लूट का यह धन राजनीतिक उद्यमियों और कारोबारी राजनेताओं के बीच में बंट जाता है।
लगभग तीन दशक पहले जनसांख्यिकीविद आशीष बोस ने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के पहले अक्षरों से 'बीमारू' शब्द गढ़ा था। यानी ये देश के कम विकसित राज्यों में से थे। तीन दशक बाद बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विकास के कुछ चिह्न दिखे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बीमार हो गया है। आर्थिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक (खासकर सांप्रदायिक) सद्भाव के पैमाने पर यह देश में सबसे खराब ढंग से शासित राज्य है। उत्तर प्रदेश की स्थिति इतनी खराब क्यों है? इसका एक कारण यह है कि दक्षिण और पश्चिम भारत के विपरीत उत्तर प्रदेश में लिंग और जाति की बराबरी से संबंधित कोई सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ। दूसरा यह कि इस राज्य को सामंतवाद विरासत में मिला है, जहां लाठीधारी जमींदार (जो कभी ब्राह्मण और राजपूत होते थे, लेकिन अब यादव और जाट हैं) गरीब किसान और कृषि मजदूरों के साथ अलग तरह का व्यवहार करते हैं। तीसरा कारण है राजनेताओं का चरित्र-जो राष्ट्रीय स्तर के हिसाब से भी देखें, तो अधिक भ्रष्ट, भाई-भतीजावाद में विश्वासी और हिंसक हैं।
लेकिन उत्तर प्रदेश की इस भयावहता का सबसे बड़ा कारण उसका विशाल आकार है। इसके मौजूदा आकार में इसकी उन समस्याओं का हल निकालना सचमुच असंभव है, जो लंबे समय से बनी हुई हैं। विगत दिसंबर में अपने कॉलम में मैंने लिखा था, 'यह एक खुला प्रश्न है कि उत्तर प्रदेश को काटकर दो, तीन या चार राज्य बनाए जाएं; वैसे में यह वैसा नहीं रहेगा, जैसा है। एक अविभाजित उत्तर प्रदेश राज्य के नागरिकों को नुकसान पहुंचा रहा है, और देश को भी।' यह अब भी उतना ही सच है, जितना आगे रहेगा। सवाल यह है कि लखनऊ में बैठने वाला स्वास्थ्य सचिव कितना भी मजबूत इरादों का क्यों न हो, वह 85 जिलों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के प्रदर्शन पर नजर भला किस तरह रख सकता है। या सबसे निडर और ईमानदार आईजी भी 20 करोड़ लोगों के बीच सामाजिक सद्भाव आखिर किस तरह बहाल कर पाएगा? एक विशालकाय राज्य की जगह चार छोटे राज्य बनें, तो उससे प्रशासन-व्यवस्था बेहतर होगी, स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधरेगी और नागरिकों की सुरक्षा भी संभव होगी। वैसे में, इस तरह का वातावरण बन सकता है, जहां ज्ञान आधारित उद्यमिता फले-फूले और रोजगार सृजन हो। तब एक पीएच.डी डिग्रीधारी सरकारी दफ्तर में चपरासी बनने के बजाय बेहतर रोजगार की उम्मीद कर सकता है।