नरेंद्र मोदी सरकार के बीते एक वर्ष पर नजर डालें, तो इसका एक महत्वपूर्ण बिंदु अक्तूबर, 2014 में दीवाली का वह दिन था, जब प्रधानमंत्री ने श्रीनगर और सियाचिन की यात्रा की थी। प्रधानमंत्री ने अपनी पहली दीपावाली पर सात रेसकोर्स रोड पर अपने आवास पर दीये जलाने के बजाय, माइनस तीस डिग्री तापमान में अपने घरों से दूर रह रहे जवानों के साथ समय बिताने और कश्मीर घाटी के लोगों तक पहुंचने का फैसला किया था। ऐसा करके उन्होंने अपने सकारात्मक नेतृत्व का परिचय देते हुए दिखाया कि वह हर दम उपलब्ध राजनेता हैं। उस दौरान उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि वह गजब के वक्ता होने के साथ ही एक ऐसे नेता हैं, जो सख्त होने के बावजूद लीक से हटकर सोच सकते हैं। पूरी भावना के साथ उन्होंने जवानों से जिन शब्दों में बात की, वे किसी कविता की तरह लगते हैं। मसलन, उनका यह कहना, ''कितने जवान यहां सफेद चादर ओढ़कर सो गए, ताकि 123 करोड़ देशवासी अपनों के साथ दीया जला सकें।'' चूंकि मोदी ने कश्मीर घाटी के लोगों तक पहुंचने की कोशिश के साथ ही दो बेगुनाह कश्मीरी युवकों को मारने के लिए सैन्य बलों के खिलाफ कार्रवाई करने की भी बात की थी। इसलिए सियाचिन में सैनिकों के प्रति जताया गया उनका आभार, दरअसल, संतुलन बनाने की एक कोशिश थी।
उसके बाद हुए चुनावों में मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व वाली नर्म पृथकतावादी पीडीपी के साथ सरकार बनाकर मोदी ने लीक से हटकर सोचने की अपनी क्षमता का परिचय दिया। यह कुछ ऐसा ही था, जैसा उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित करके किया था। कभी 'हिंदू हृदय सम्राट' कहे जाने वाले मोदी के इस फैसले में जोखिम तो था, मगर सही ढंग से लागू होने पर यह फैसला न केवल विवादग्रस्त्ा राज्य के तीनों क्षेत्रों को जोड़कर रख सकता है, बल्कि कश्मीर और पाकिस्तान के संदर्भ में एक नई शुरुआत भी कर सकता है।
एनडीए सरकार का यह पहला वर्ष पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साल था। कुछ वैसे ही, जैसे 16 मई, 2014 को भाजपा को मिली चुनावी जीत अकेले उनकी ही देन थी। पूरी पार्टी उनके पीछे खड़ी दिख रही है। भाजपा के भीतर उनकी मुखालफत करने वाली शायद कोई आवाज नहीं बची है। आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शक मंडल की, जिसके मोदी भी सदस्य हैं, अब तक एक भी बैठक नहीं हुई है। बलिया के सांसद जमीनी हकीकत में ज्यादा बदलाव न आने की बात करते हैं, तो अरुण शौरी 'दिशाविहीन' अर्थव्यवस्था के लिए सरकार को आड़े हाथ लेते हैं। मगर, विरोध की इन आवाजों को तवज्जो नहीं मिल पाई है। मोदी की छवि एक काम करने वाले नेता की है। वह अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का भी प्रदर्शन करते रहे हैं। पड़ोसी देश नेपाल में भूकंप आने के तुरंत बाद उन्होंने मोर्चा संभालते हुए 24 घंटों के भीतर तीन इमरजेंसी बैठकें बुलाईं, जिन्हें आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों तक ने गैर-जरूरी माना। यह अलग बात है कि श्रेय बटोरने और मोदी को मसीहा जताने की इन कोशिशों ने नेपाल में एक बड़े तबके को भारत के खिलाफ कर दिया।
एक नेता के तौर पर मोदी ने प्रधानमंत्री के पद को नई ऊर्जा दी है। एक के बाद एक नई योजनाएं शुरू की गईं, मसलन, जन धन योजना, बेटी बचाओ योजना, लड़कियों के लिए शौचालय और स्वच्छ भारत मिशन। इन योजनाओं ने मध्यवर्ग का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इसके अलावा अति निर्धनों के लिए चलाई गई बीमा योजना भी है। ऐसी योजनाओं के जरिये नरेंद्र मोदी ने अपनी गरीब-विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक छवि को बदलने की कोशिश की है।
विदेश यात्राओं के लिए उनकी आलोचना भी हुई। पिछले एक वर्ष में वह 18 देशों की यात्रा कर चुके हैं। निवेश आमंत्रित करने की उम्मीद में उन्होंने 'मेक इन इंडिया' योजना से विभिन्न देशों का परिचय कराया है। इसमें उन्होंने भारतीय मूल के लोगों का भी असरदार ढंग से उपयोग किया है। देश-विदेश में अपनी लोकप्रियता और पूर्ण बहुमत का हवाला देते हुए उन्होंने यह संदेश दिया कि वह भारत में व्यापार की प्रक्रिया को आसान बनाने का माद्दा रखते हैं। वैश्विक नेताओं ने भी अपनी पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाने वाले इस नेता में रुचि दिखाई है।
कामयाब नेता वह होता है, जो लोगों से संवाद कायम कर सके। मोदी इस प्रतिभा के धनी हैं। जापान में ड्रम बजाकर और चीनी प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी खींचकर उन्होंने सबका ध्यान जरूर खींचा है, मगर निवेशक प्रचार से ज्यादा, जमीनी हकीकत पर भरोसा करते हैं। यही वजह है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक मोदी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी है कि देश में सामाजिक सौहार्द कायम रहे। हालांकि मोदी 'सबका साथ सबका विकास' की बात करते हैं, मगर उनके ही लोग चर्च और ईसाइयों पर हमले, लव जिहाद और घर वापसी जैसे मुद्दों पर ऊटपटांग बयान देते रहते हैं। समय-समय पर मोदी ने इस पर नाराजगी जरूर जताई है, मगर वह इन्हें रोक नहीं पाए हैं। हालांकि मोदी जैसे हैं, उसमें इन्हें रोकने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए थी। यदि अगले दो वर्षों में होने वाले चुनावों में भाजपा जीत भी जाए, तब भी जरूरी विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं होगा। मोदी के सामने चुनौती यह भी है कि उन्होंने जैसी छवि बनाई है, लोग उनसे महज घोषणाएं नहीं, बल्कि उन्हें तुरंत पूरा करने की भी उम्मीद कर रहे हैं। उन्हें टीम मोदी की जरूरत है और इसका मतलब है कि अधिकारों का विकेंद्रीकरण और मंत्रियों को काम करने की छूट। दिक्कत यह है कि गवर्नेंस का उनका मॉडल्ा पीएमओ के हाथ में ताकत के केंद्रीकरण पर आधारित है, जिसमें भारत जैसे विशाल और जटिल देश के संदर्भ में फैसले में देरी स्वाभाविक है। पिछले एक वर्ष का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि यूपीए के मौन प्रधानमंत्री की जगह पर भारतीय राजनीति में एक ऐसे शख्स का प्रवेश हुआ है, जो भारत के परिवार का मुखिया कहा जा सकता है। बेशक, आप उनसे सहमत हों, या नहीं।