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पाकिस्तानी सेना को चुनौती और अस्थिरता की जड़ें

बलबीर पुंज Published by: बलबीर पुंज Updated Fri, 30 Oct 2020 03:21 AM IST
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पाकिस्तान

विगत कई दिनों से पाकिस्तान विभिन्न घटनाक्रमों से गुजर रहा है। 26 अक्तूबर (सोमवार) को पाकिस्तानी संसद ने ‘इस्लाम विरोधी वक्तव्य’ देने वाले फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। इस्लाम के नाम पर वहां मजहबी एकजुटता दिखाने का प्रयास ऐसे समय पर हुआ, जब पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई के खिलाफ विपक्षी दलों और सिंध पुलिस ने बगावत का बिगुल फूंक दिया था। क्या ऐसा संभव है कि विपक्षी दलों की एकता पाकिस्तान में लोकतंत्र की नई सुबह लेकर आए और पुलिस विद्रोह के बाद वहां सेना का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाए? इसका उत्तर दो तथ्यों में छिपा है। पहला, पाकिस्तान की राजनीति में मुल्ला-मौलवियों और सेना का वर्चस्व है। दूसरा, इस इस्लामी देश का वैचारिक अधिष्ठान और स्थिरता विरोधाभासी है। यह किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान जनता द्वारा ‘निर्वाचित’ कम, सेना द्वारा ‘स्थापित’ अधिक हैं। उनके विरुद्ध वहां 11 विपक्षी दलों ने पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) नामक गठबंधन बनाया है। 



यह घमासान उस समय और बढ़ गया, जब नवाज शरीफ के दामाद मुहम्मद सफदर को कराची पुलिस ने 18-19 अक्तूबर की आधी रात को होटल में उनके कमरे का दरवाजा तोड़कर गिरफ्तार कर लिया। उस समय वह अपनी पत्नी मरियम के साथ थे। सफदर पर जिन्ना की मजार की पवित्रता भंग करने का आरोप था। खुलासा हुआ कि सेना ने सिंध पुलिस के एक उच्चाधिकारी का अपहरण कर उन पर सफदर को गिरफ्तार करने का दबाव बनाया था। इसके बाद जो कुछ हुआ, उसका आभास शायद सेना और इमरान खान सरकार को नहीं था। विरोधस्वरूप, सिंध पुलिस के कई बड़े अधिकारी छुट्टी पर चले गए और पुलिसकर्मी, सेना और आईएसआई के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। जब सेना को यह अनपेक्षित विद्रोह बर्दाश्त नहीं हुआ, तो उसने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं, जिसमें 10 पुलिसकर्मी मारे गए। 


पाकिस्तान में सेना के खिलाफ बगावत पहली बार नहीं हुई है। वर्ष 2007 में भी तत्कालीन सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ और न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी के बीच तनातनी की स्थिति आई थी। वास्तव में, इस अस्थिरता की जड़ें उस सभ्यतागत द्वंद्व में है, जिसमें पाकिस्तान अपनी मूल हिंदू-बौद्ध सांस्कृतिक पहचान से दूरी बनाने और स्वयं को मध्य पूर्व एशियाई देश के रूप में परिभाषित करने का प्रयास कर रहा है। इस विरोधाभास का मुखर उदाहरण मोहम्मद अली जिन्ना का वह भाषण भी है, जो उन्होंने 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा को संबोधित करते हुए दिया था। उन्होंने कहा था, 'पाकिस्तान में हर व्यक्ति मंदिर और मस्जिद या फिर अन्य किसी पूजास्थल में जाने के लिए स्वतंत्र होगा। व्यक्ति के मजहब, जाति और पंथ से राज्य को कोई मतलब नहीं होगा।' वास्तव में, जिन्ना के मुख से यह सर्वधर्म सद्भाव जैसा उद्गार शायद उनके हिंदू पूर्वजों के संस्कारों का परिणाम रहा होगा, जिसका ‘काफिर-कुफ्र’ की अवधारणा पर जन्मे पाकिस्तान में कोई स्थान नहीं। 


जिन्ना का यह विचार उस ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ के भी विरुद्ध था, जो स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंदुओं के साथ बराबर बैठने में घृणा से सिंचित था, जिसमें 600 वर्षों तक पराजित हिंदुओं पर राज करने की भावना थी। इसीलिए 1949 में पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने ‘शरीयत’ को अंगीकार कर लिया। राजनीति के प्रारंभिक दशकों में न तो जिन्ना ने स्वयं को मुस्लिमों का नेता माना और न ही मुसलमानों ने उन्हे अपना रहनुमा। संभवत: इसकी जड़ उनके व्यक्तिगत जीवन और पारिवारिक इतिहास में है। जिन्ना के दादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर हिंदू थे, जो गुजरात में काठियावाड़ स्थित पनेली गांव में लोहाना समाज-परिवार से संबंधित थे। चूंकि लोहाना शुद्ध शाकाहारी समुदाय था, इसलिए समाज ने प्रेमजीभाई के मछली के व्यापार का बहिष्कार किया। प्रेमजीभाई के बेटे (जिन्ना के पिता) पुंजालाल ठक्कर ने इसका विरोध करते हुए इस्लाम अंगीकार कर लिया। 


किंतु उन्होंने अपने बच्चों को इस्लामी मान्यताओं के अनुरूप शिक्षा-दीक्षा कभी नहीं दिलाई। इसका प्रभाव यह हुआ कि जिन्ना ने जो जीवन-शैली अपनाई, वह इस्लाम विरोधी रही। उदाहरणस्वरूप, जिन्ना शूकर-मांस और शराब का सेवन करते थे। जिन्ना ने पारसी समुदाय की रत्तनबाई पेटिट से विवाह किया, जो इस्लामी बंधनों से मुक्त रहीं। दोनों की एकलौती सुपुत्री डीना ने पारसी उद्योगपति नेविल वाडिया से विवाह किया और विभाजन के बाद भारत को अपनी मातृभूमि बताया। केवल अपने पिता के देहांत पर डीना सितंबर 1948 में पहली और आखिरी बार पाकिस्तान गई थीं। संपन्न-समृद्ध वाडिया परिवार के वंशज आज भी मुंबई में रहते हैं।


पाकिस्तान का वैचारिक खोखलापन उसके राष्ट्रगान में भी नजर आता है। जिन्ना ने हिंदू मूल के उर्दू शायर जगन्नाथ आजाद द्वारा लिखित एक उर्दू गीत को राष्ट्रगान बनाया था। अब चूंकि इसे एक ‘काफिर’ हिंदू ने लिखा था, इसलिए इसका पाकिस्तानी नेतृत्व से लेकर आम लोगों ने भारी विरोध किया। परिणामस्वरूप, कुछ समय के भीतर इसे प्रतिबंधित कर दिया गया और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रगान के रूप में एक बिना गीत वाली धुन बजा दी जाती थी। वर्ष 1954 में हाफिज जालंधरी द्वारा फारसी में लिखित गाने को आधिकारिक राष्ट्रगान बनाना सुनिश्चित हुआ। इस इस्लामी देश की आधिकारिक राष्ट्रीय भाषा उर्दू और अंग्रेजी है। इसके अतिरिक्त वहां पंजाबी, सिंधी, पश्तो, बलूची, सराइकी इत्यादि भाषाएं बोली जाती हैं। फिर भी ‘कौमी-तराना’ उस विदेशी फारसी भाषा में लिखा हुआ है, जिसे बोलने/समझने वालों की संख्या पाकिस्तान में सीमित है। इसमें उर्दू के नाम पर केवल ‘का’ शब्द का उपयोग हुआ है। पाकिस्तान की त्रासदी उस जुमले में भी झलकती है, जिसे मैंने अधिकांश पाकिस्तानियों के मुख से ही सुना है। हर देश के पास सेना होती है, किंतु पाकिस्तान उन अपवादों में से एक है, जिसमें सेना के पास पूरा देश है। उसकी अस्थिरता का कारण उसके मजहबी डीएनए में है।


(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

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