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चुप्पी एक खतरनाक संकेत है: केंद्रीय बैंकों की नई रणनीति पर उठते सवाल, बाजारों में बढ़ सकती है अनिश्चितता

शंकर अय्यर
Updated Tue, 07 Jul 2026 06:51 AM IST

सार

ऐसे वक्त में, जब दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों से सर्वाधिक सक्रिय रहने की उम्मीद की जा रही है, तब उनका बाजार के उतार-चढ़ावों को लेकर उदासीन बने रहने का निर्णय कितना कारगर साबित होगा, यह तो समय ही बताएगा। हालांकि, भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाएं ये जोखिम शायद ही उठाएं।
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बैंक - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


ईसीबी की अध्यक्षा क्रिस्टीन लेगार्ड ने तो अफसोस जताते हुए कहा भी कि वह इससे ‘बंधी हुई और मजबूर’ महसूस करती हैं। अमेरिका के केंद्रीय बैंक के नए चेयरमैन केविन वॉर्श ने ‘साझा रुख’ अपनाया यानी कोई ‘फॉरवर्ड गाइडेंस’ (भविष्य के बारे में संकेत) नहीं। गौरतलब है कि भारत के रिजर्व बैंक ने अभी तक ‘चुप्पी’ नहीं साधी है और वह बाजार के उतार-चढ़ाव पर सक्रिय प्रतिक्रिया देता रहा है। विकासशील अर्थव्यवस्थाएं चुप रहने का जोखिम उठा भी नहीं सकतीं। केंद्रीय बैंकों के एक तरह से उदासीन हो जाने की यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब उनसे सर्वाधिक सक्रिय रहने की उम्मीदें की जा रही हैं।


‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ की एक रिपोर्ट में एआई में निवेश की तेजी को वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बताया गया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ऊंची दरों या एआई सेक्टर में गिरावट से कीमतों में बदलाव 2008 के संकट जितना ही नुकसानदेह हो सकता है। हैरानी की बात है कि शोधकर्ता बड़े संकटों की चेतावनी दे रहे हैं; और जिम्मेदार लोग चुप्पी साधने का जोखिम उठा रहे हैं। ये जोखिम महज काल्पनिक नहीं हैं। टेक कंपनियां एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर दस खरब डॉलर से अधिक खर्च कर रही हैं। यह सच है कि इन कंपनियों के पास बहुत पैसा है। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि उन्हें जितनी नकदी की जरूरत है, उतनी उनके पास नहीं है। इस अंतर को कर्ज से पूरा किया जाता है, जिसमें से ज्यादातर हिस्सा बीमा कंपनियों और बैंकों से जुड़े ‘ऑफ-बैलेंस-शीट’ माध्यमों के जरिये आता है। इसमें सर्कुलरिटी और ऐसे अस्पष्ट सौदे भी जोड़ लें, जिनमें एक ही संपत्ति को दो बार गिरवी रखने का जोखिम होता है। बैंकर यह बात जानते हैं।


सिंट्रा में जो निर्णय लिया गया है, वह केंद्रीय बैंकों की चुप्पी के पक्ष में यह तर्क देता है कि अतीत में भी दुनिया बिना किसी दिशा-निर्देश के भी काम चला लेती थी। यह सच है कि 1994 तक, फेडरल रिजर्व ने ‘फंड्स रेट’ का खुलासा नहीं किया था। यहां तक कि इसके लिए उसने कानूनी लड़ाई भी लड़ी थी। दरों की घोषणा फरवरी 1994 में शुरू हुई-ठीक उसी बैठक में, जिसने 15 खरब डॉलर के बॉन्ड बाजार में भारी गिरावट को जन्म दिया था। गिरावट ने वह कर दिखाया, जो कोर्ट नहीं करवा पाया था। ‘फॉरवर्ड गाइडेंस’ (भविष्य के बारे में संकेत) एक दशक बाद आया। बाजार अब पुराने समय की धीमी रफ्तार से बहुत आगे निकल चुके हैं। बाजार अब सेंटीमेंट इंजन और मिलीसेकंड में ट्रेडिंग करने वाले एल्गोरिदम से चलता है। ऐसे में, सिंट्रा में लिए गए फैसले के बाद अर्थव्यवस्था में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होना तय है।


केंद्रीय बैंकों के रुख से एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। केंद्रीय बैंकरों ने बार-बार कहा है कि वे सरकारों के घाटे, टैरिफ या वित्तीय खर्च पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, क्योंकि ये चीजें किसी भी आउटपुट गैप की तुलना में महंगाई को ज्यादा बढ़ाती हैं। अब वे महंगाई या दरों पर भी अपनी राय या इरादे जाहिर नहीं करेंगे। अगर केंद्रीय बैंक कीमतों का निर्धारण बाजारों पर छोड़ देते हैं और न तो कोई टिप्पणी करते हैं और न ही भविष्यवाणी, तो उनका औचित्य क्या रह जाता है?


बेशक, वे पॉलिसी रेट तय करेंगे। हालांकि, पॉलिसी रेट का असर सिर्फ ओवरनाइट मनी (बहुत कम समय के लिए लिए जाने वाले ऋण) पर ही पड़ता है। जो चीजें असल में मायने रखती हैं-मॉर्गेज, बॉन्ड, येन और रुपया-उनकी कीमत पॉलिसी के भविष्य के अनुमानों के आधार पर तय होती है। वर्तमान के बारे में पारदर्शिता और भविष्य के बारे में चुप्पी कोई पॉलिसी नहीं, बल्कि एक खतरनाक विरोधाभास है।


1966 में ऐन रैंड के न्यूजलेटर में ग्रीनस्पैन ने लिखा था: ‘घाटे का खर्च असल में संपत्ति जब्त करने का एक तरीका है।’ यह कड़ा वैचारिक रुख सिर्फ कागजों तक ही सीमित था। अमेरिकी फेडरल रिजर्व का पद संभालने के कुछ ही समय बाद, ग्रीनस्पैन ने अपना नजरिया और सिद्धांत बदल लिए। फिर, उन्होंने वैकल्पिक मॉनेटरी थ्योरी (पैसे से जुड़ी वैकल्पिक सोच) को छोड़कर बाजार के साथ मिलकर मनमानी कीमत तय करने का तरीका अपनाया। इस रणनीति का आधार साफ तौर पर बेमेल बातें और पर्दे के पीछे की कार्रवाई थी-जैसे 1987 में मार्केट को बचाना, एलटीसीएम का डूबना और डॉट-कॉम बबल का फटना। असल में ‘फेड पुट’ की शुरुआत ‘ग्रीनस्पैन पुट’ के तौर पर हुई थी।
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लोगों का मानना था कि ग्रीनस्पैन बाजार को बचाने के लिए आगे आएंगे। उनकी यह छवि तब खराब हुई, जब 2008 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस के सामने माना कि उन्हें उस मॉडल में एक कमी मिली है, जिसके तहत यह माना जाता था कि बाजार खुद को अनुशासित रखते हैं। काम करने के तरीके के मामले में वॉर्श, ग्रीनस्पैन के उत्तराधिकारी हैं, यानी जानबूझकर अस्पष्टता बनाए रखना, सरकारी आंकड़ों पर भरोसा न करना और यह मानना कि बिना गाइडेंस के बाजार खुद परिपक्व होते हैं।


इस सोच के सामने जल्द ही चुनौतियां आने वाली हैं-जैसे टेक स्टॉक के वैल्यूएशन में कंसंट्रेशन रिस्क, प्राइवेट क्रेडिट में अस्पष्टता के कारण रिडेम्पशन गेट्स (पैसे निकालने पर रोक) की नौबत आना, और सरकारों का बेतहाशा खर्च। हो सकता है कि केंद्रीय बैंकों को यह न दिखे, लेकिन सिंट्रा की आम सहमति ने एक ऐसे ‘चर्च’ को मान्यता दी है, जिसने उपदेश देना बंद कर दिया है।

edit@amarujala.com
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