यह तथ्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच की प्रगति रिपोर्ट सरकार से साझा करने के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को कड़ी फटकार लगाई है।
न्यायालय ने यह भी कहा है कि सीबीआई को राजनीतिक आकाओं से आदेश लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन इसे भी ध्यान में रखना चाहिए कि इस मामले में जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
इसकी वजह यह है कि सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला अभी विचाराधीन है। इसलिए न्यायालय ने जो भी कहा है, वह कोई बाध्यकारी आदेश नहीं है, बल्कि न्यायिक कार्यवाही के बीच न्यायालय द्वारा की गई केवल एक टिप्पणी है।
इस संदर्भ में शीर्ष अदालत का अंतिम फैसला आना बेशक अभी बाकी है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस टिप्पणी के जरिये शीर्ष अदालत ने कुछ जरूरी सवाल उठाए हैं।
न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सीबीआई द्वारा दिए गए हलफनामे में सरकार से जांच रिपोर्ट साझा करने की बात पर नाराजगी जताई है, क्योंकि उसने इस मामले की जांच से संबंधित रिपोर्ट किसी से साझा न करने की सीबीआई को पहले ही हिदायत दी थी।
लिहाजा अदालत ने यह पूछा है कि क्या सीबीआई के मैनुअल में इसका उल्लेख है कि इस तरह के मसौदे कानून मंत्री के साथ साझा किए जाएं, और क्या कानून मंत्री को इस तरह का कोई अधिकार है? यह सीधे-सीधे सरकार के उस रवैये पर टिप्पणी है, जिसके तहत वह इस जांच एजेंसी को अपने मनमुताबिक चलाती है।
इसके अलावा सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के इस बयान पर भी सवाल उठ रहे हैं कि सीबीआई सरकार का अंग है। उनकी इस टिप्पणी से यही साबित होता है कि केंद्रीय जांच एजेंसी स्वतंत्र नहीं है।
यहां सबसे जरूरी यह है कि सीबीआई की वैधानिक स्थिति समझी जाए। सीबीआई भारत सरकार की प्रमुख जांच एजेंसी है। सरकार और सीबीआई के संबंधों के दो पहलू हैं। सरकार प्रशासकीय मामलों में सीबीआई से जानकारी तो ले सकती है।
उदाहरण के लिए, अगर कानून मंत्री सीबीआई से यह पूछता है कि लंबित मुकदमों की संख्या कितनी है या मामलों को निपटाने में विलंब क्यों हो रहा है वगैरह-वगैरह, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन सरकार अगर अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सीबीआई पर किसी विशेष मामले में की जा रही छानबीन को तेज या धीमा करने का दबाव बनाती है, तो यह सरासर गलत है।
सीबीआई के सेवा-नियमों की किसी पुस्तिका में यह नहीं लिखा है कि उसे सरकार को रिपोर्टिंग करनी चाहिए। स्पष्ट है कि किसी मुद्दे की छानबीन के मद्देनजर सीबीआई सरकार के प्रति कतई जवाबदेह नहीं है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर स्थिति अलग है।
गठबंधन सरकार में जब घटक दल अपनी मांगों को लेकर सरकार पर हावी होने की कोशिश करते हैं, तब सरकार सीबीआई का डर दिखाकर इन दलों पर दबाव बरकरार रखती है।
यानी सरकार सीबीआई का हथियार की तरह इस्तेमाल करती है। अब कोल ब्लॉक आवंटन के ताजा मामले को ही लें। सरकार शुरू से यह कहती आई है कि सीबीआई के कामकाज के किसी भी स्तर पर सरकार ने कोई अनुचित हस्तक्षेप नहीं किया। और सीबीआई भी यही कहती रही कि उसने हलफनामा किसी को नहीं दिखाया था।
हालांकि अंतिम फैसला आना अभी बाकी है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद यह लगभग साफ हो चला है कि सरकार ने सीबीआई के काम में दखलंदाजी की है। उसने सीबीआई द्वारा तैयार रिपोर्ट के कुछ हिस्से बदले हैं, क्योंकि वह कोयला घोटाले की सच्चाई सामने नहीं लाना चाहती।
ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि सीबीआई को स्वतंत्रता दी जाए। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। दरअसल, जब तक सरकार को बनाने और कायम रखने में सीबीआई का इस्तेमाल होता रहेगा, तब तक यह स्वतंत्र नहीं रह सकती। और केवल सीबीआई के बारे में कानून बनाने से भी कुछ नहीं होगा। जरूरी यह है कि व्यापक व्यवस्थाजन्य सुधार किए जाएं।
इस मामले पर हो रही राजनीति अपनी जगह वाजिब है। विपक्ष को आलोचना का अधिकार तो है ही। सरकार के रवैये से उस पर सवाल उठेंगे ही। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा हो, तब इसका कोई कानूनी औचित्य नहीं है कि सरकार सीबीआई से प्रगति रिपोर्ट को देखने की मांग करे और सीबीआई सरकार की आज्ञा का पालन करे।
हालांकि राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में अच्छा यह होता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में मिलकर काम करें। तभी स्वच्छ राजनीति होगी। आरोप-प्रत्यारोप से नुकसान देश की जनता का ही होता है।