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सियासत: जातिगत जनगणना से किसे फायदा होगा, इसके पीछे क्या है तर्क

के. सी. त्यागी
Updated Tue, 28 Feb 2023 06:15 AM IST

सार

इसके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि सरकारी नीतियां जाति आधारित हैं। प्रामाणिक आंकड़े सरकार के पास होंगे, तो योजना बनाने में लाभ होगा।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : PTI


महाराष्ट्र के महात्मा फुले समता परिषद की ओर से उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण को आगे बढ़ाना सरकार की जिम्मेदारी है। इसलिए उनकी ठीक संख्या का पता न लगाना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 340 का उल्लंघन है। जाति आधारित जनगणना के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि सभी सरकारी नीतियां जाति आधारित हैं। आरक्षण भी जाति के आधार पर दिया जाता है। नीति आयोग और इससे पूर्व योजना आयोग जाति के आधार पर योजना बनाता आया है। इसलिए जाति की जनगणना से प्रामाणिक आंकड़े सरकार के पास होंगे, तो योजना बनाने में लाभ होगा। यह मांग काफी पुरानी है। आजादी से पहले ब्रिटिश राज में भारत में जाति आधार पर जनगणना होती रही है। 1931 तक जातियों की गिनती होती रही है। 1941 के बाद ऐसी कोई गिनती नहीं हुई।


जाति आधारित जनगणना कई विवादों में फंसी रही है। 1901 के बाद कई जाति समूह जनगणना करने वालों से अलग कास्ट स्टेटस की भी मांग करने लगे। वंश परंपरा का हवाला देते हुए कुछ जातियों के लोग खुद को ब्राह्मण वर्ग में शामिल करने की मांग करने लगे। कुछ जातियों को क्षत्रिय एवं वैश्य साबित करने के लिए प्रयास होने लगे। यह जाति के आधार पर श्रेष्ठता तय करने का दौर था। आज जाति किसी समूह के पिछड़ेपन की निशानी भी है। मंडल आयोग ने गैर हिंदू समुदायों में भी विद्यमान पिछड़ी जातियों का वर्गीकरण किया है, जिसके कारण कई मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय को भी पिछड़े वर्ग में शामिल कर उन्हें भी आरक्षण की श्रेणी में शामिल किया था। पिछड़े वर्ग के नेता मानते हैं कि उनकी आबादी लगभग 60 फीसदी है। जाहिर है कि जातिगत जनगणना नए राजनीतिक समीकरण बना सकती है।


नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार को कर्पूरी फार्मूले पर अमल करने का सुझाव दिया है। फिलहाल केंद्र द्वारा अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण कोटे का बंटवारा नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने 12 फीसदी का कोटा अति पिछड़ों के लिए लागू किया था, जिसका बड़ा विरोध उन्हीं की जनता पार्टी ने किया और उन्हें मुख्यमंत्री पद गंवाना पड़ा। एनडीए सरकार ने अक्तूबर, 2017 में अति पिछड़े वर्ग के अंतर्गत सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से रोहणी आयोग का गठन किया था। वर्तमान में ओबीसी में मौजूदा 5,000 जातियों को उप वर्गीकृत करने के कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी उसे दी गई थी। आधिकारिक तौर पर रोहिणी आयोग की रपट प्रकाशित नहीं हो पाई है, जानकारों के मुताबिक, ओबीसी कोटे को चार भागों में बांटने की संस्तुति की गई है। आंकड़े बताते हैं कि केवल पिछले पांच वर्षों में ओबीसी की 2,633 जातियों में 10 जाति समूहों को कोटे का 25 फीसदी (एक चौथाई) लाभ मिला है। 1,000 जाति समूह तो ऐसे भी रहे, जिन्हें इस कोटे से एक भी प्रतिशत लाभ नहीं मिला। इससे नई असमानता पैदा हो गई है।


-लेखक जनता दल (यू) के प्रधान महासचिव हैं।

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